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UP: नोबेल विजेता सीवी रमन ने बांटी थीं डिग्रियां, आगरा विवि के 100 साल के सफर से जुड़े अनसुने किस्से

Wed, 01 Jul 2026 10:03 AM IST
Dhirendra Singh देश दीपक तिवारी, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
देश दीपक तिवारी, अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Wed, 01 Jul 2026 10:03 AM IST
सार

आगरा विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष पर उसके इतिहास के कई रोचक प्रसंग सामने आए हैं। वर्ष 1931 में नोबेल विजेता सर सीवी रमन ने यहां दीक्षांत समारोह में छात्रों को डिग्रियां बांटी थीं, जबकि पहले कुलपति ए.डब्ल्यू. डेविस ने भारत छोड़ते समय भवन निर्माण के लिए 50 हजार रुपये दान दिए थे।
 

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When Nobel Laureate C.V. Raman Awarded Degrees: Untold Stories from Agra University's 100-Year Journey
सर चंद्रशेखर वेंकट रमन (C V Raman) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 शताब्दी वर्ष में प्रवेश तक के सफर में विश्वविद्यालय में कई रोचक किस्से हैं। नोबेल विजेता महान वैज्ञानिक सर सीवी रमन ने यहां वर्ष 1931 में चौथे दीक्षांत समारोह में छात्रों को डिग्रियां बांटी थीं। तब विश्वविद्यालय किराए के भवन में चलता था। तत्कालीन कुलपति दीवान चंद की 1931-32 की रिपोर्ट में बताया गया है कि विज्ञान के क्षेत्र में वर्ष 1930 में नोबेल प्राप्त करने पहले अश्वेत और महान भारतीय वैज्ञानिक सर सीवी रमन 21 नवंबर, 1931 को आगरा कॉलेज आए थे। उन्होंने छात्रों की डिग्रियां बांटी थीं। कुल 468 स्नातकों को डिग्रियां प्रदान की गई थीं।
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पिलानी के बिड़ला कॉलेज में नहीं शुरू हो सकीं कक्षाएं
रिपोर्ट में पिलानी (राजस्थान) के बिड़ला कॉलेज को कला और वाणिज्य स्नातक परीक्षाओं के लिए संबद्धता देने का जिक्र है। हालांकि, एक अप्रत्याशित अड़चन के कारण कॉलेज उस सत्र से डिग्री कक्षाएं शुरू नहीं कर सका। इसका कारण यह था कि कॉलेज ने आगरा विश्वविद्यालय में आवेदन करने से पहले जयपुर रियासत से डिग्री कॉलेज का दर्जा बढ़ाने की अनुमति नहीं ली थी। रियासत ने बाद में यह अनुमति देने से इनकार कर दिया था।
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बड़े कॉलेजों की छोटा विश्वविद्यालय बनने की होड़ का विरोध
तत्कालीन यूनाइटेड प्रोविंस (अब उत्तर प्रदेश) में उस समय 5 विश्वविद्यालय थे। कुलपति ने अपनी रिपोर्ट में चिंता जताई थी कि पोस्ट-ग्रेजुएट स्तर पर एक ही विषय की पढ़ाई कई जगह होने से संसाधनों की बर्बादी हो रही है। उन्होंने सुझाव दिया था कि संसाधनों के किफायती उपयोग और दक्षता के लिए कॉलेजों के बीच समन्वय होना चाहिए ताकि हर बड़ा कॉलेज एक छोटा विश्वविद्यालय बनने की होड़ में न लगे। इसी कड़ी में 1933-34 से इंटर-कॉलेजिएट व्याख्यान शुरू करने की पहल की गई थी।

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