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कारगिल विजय दिवस: आगरा के कई सपूतों ने भी दी है शहादत, सभी को किया गया नमन; पूरे शहर को उन बेटों पर गर्व

Wed, 26 Jul 2023 03:05 PM IST
भूपेन्द्र सिंह अमर उजाला, आगरा
अमर उजाला, आगरा Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Wed, 26 Jul 2023 03:05 PM IST
सार

कारगिल विजय दिवस: आगरा के कई सपूतों ने भी शहादत दी है। उन सभी वीरों को नमन किया गया। पूरे शहर को अपने उन बेटों पर गर्व हैं। 

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Tributes paid to martyrs on Kargil Vijay Diwas in Agra
कारगिल विजय दिवस: आगरा में लोगों ने वीर चक्र से सम्मानित शहीद कुंवर सिंह जी को किया नमन। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तर प्रदेश के आगरा में कारगिल विजय दिवस पर शहीदों को नमन किया गया। वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में आगरा के कई सपूतों ने भी शहादत दी है। किसी का बेटा गया तो किसी का पति। किसी ने भाई खोया तो किसी ने बुढ़ापे की लाठी। कारगिल शहीद दिवस पर कुछ ऐसे ही वीर सपूतों की कहानियां आपके सामने पेश कर रहा है अमर उजाला।

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शादी के तीन महीने बाद ही वतन पर कुर्बान हुए हसन

कारगिल शहीद हसन मोहम्मद का परिवार सेक्टर पांच आवास-विकास कॉलोनी में रहता है। परिवार ने बड़े अरमानों के साथ बड़े बेटे हसन के सिर पर सेहरा बांधा। तीन महीने बाद ही कारगिल युद्ध छिड़ा तो हसन मोहम्मद भी अपनी यूनिट के साथ पाकिस्तानी घुसपैठियों को सबक सिखाते हुए देश पर कुर्बान हो गए। हसन के भाई फरियाद खान कहते हैं कि भाई के जाने के बाद भाभी ने उनके परिवार को ही अपना परिवार माना। आज भाभी, मां और हम दो भाई संयुक्त परिवार में रहते हैं।

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पिता की शहादत को बेटे का सलाम

कारगिल युद्ध में शहीद हुए आगरा के ही सीक्यूएमएच अमरुद्दीन का परिवार ताजनगरी में निवास करता है। बेटे आरिफ बताते हैं कि पिता जब कारगिल युद्ध में शहीद हुए तो वह करीब नौ साल के होंगे। मां ने मामा के सहयोग से न केवल परिवार को संभाला बल्कि हमारी पढ़ाई-लिखाई भी कराई। बंगलुरू से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अब मैं गैस एजेंसी संभाल रहा हूं। छोटे भाई की इंजीनियरिंग भी पूरी हो गई। मैंने पिताजी की विशाल मूर्ति मैनपुरी में अपनी गैस एजेंसी के परिसर में लगा रखी है। आज हम जो भी हैं उन्हीं की बदौलत हैं।

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24 साल बाद भी नहीं बना प्रवेश द्वार

मूल रूप से फतेहपुर सीकरी के गांव बसेरी काजी निवासी जाट रेजीमेंट के हवलदार कुमार सिंह को उनके शौर्य के लिए भारत सरकार ने शौर्य चक्र प्रदान किया। लेकिन उनकी जन्मस्थली पर उनके नाम से प्रवेश द्वार बनाने की घोषणा 24 साल बाद भी अधूरी है। बेटे रातेंद्र कुमार ने बताया कि सेना और सरकार ने तो घोषणा के अनुरूप सारे वादे पूरे किए। लेकिन, पैतृक गांव में उनके नाम से प्रवेश द्वार अभी तक नहीं बन सका है। दर्जनों बार जिला प्रशासन से लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों तक को कई बार पत्र लिख चुके हैं।

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पति के जाने के बाद खुद को संभाला

आगरा कॉलेज में भौतिक विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. संध्या मान के पति लेफ्टिनेंट कर्नल आरएस मान मूलरूप से हरियाणा (करनाल) के निवासी थे। डॉ. संध्या बताती हैं कि पति शहीद हुए तो लगता था मेरी दुनिया ही उजड़ गई। पति की शहादत ने मुझे अंदर से तोड़ दिया था। पति की वीरता के लिए शौर्य चक्र मिला तो बेटे का नाम भी शौर्य रख दिया। शौर्य ने हाल ही में न्यूयार्क विवि से भौतिकी में ही स्नातक की डिग्री प्राप्त की है। जीवन की राह बहुत कठिन है लेकिन मैं और मेरा बेटा सारी बाधाओं से पार निकलकर ही रहेंगे।

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