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यूपी चुनाव 2022: दीपक की लौ में झुलस गई थी दो बैलों की जोड़ी
Mon, 17 Jan 2022 12:20 PM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कासगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, कासगंज
Published by: आगरा ब्यूरो
Updated Mon, 17 Jan 2022 12:20 PM IST
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यूपी चुनाव 2022
- फोटो : अमर उजाला
कासगंज जिले की सियासत में 1962 में हुए तीसरे विधान सभा चुनाव से ही जातिय एवं धार्मिक ध्रुवीकरण की एंट्री हो गई। जिससे दीपक की लौ में दो बैलों की जोड़ी झुलस गई। जनसंघ ने कांग्रेस को कड़ी चुनौती देते हुए जिले की तीन सीटों में से कासगंज व सहावर की सीट अपने नाम कर ली।
विधान सभा के लिए 1952 में हुए पहले आम चुनाव में जनसंघ कोई खास असर नहीं दिखा सका। कासगंज वेस्ट से जनसंघ के प्रत्याशी भगवान सिंह 5वें स्थान पर तथा कासगंज नोर्थ में रामस्वरूप 7वें स्थान पर रहे। इसके बाद 1957 के चुनाव में इस पार्टी ने अपने वोट बैंक में सुधार किया तो कासगंज में हेमराज व सहावर में सूबेदार सिंह चौथे तथा सिढ़पुरा में हरीश चंद्र तीसर स्थान पर रहे। 1962 के चुनाव में जिले की सियासत का परिदृश्य एकदम से बदल गया। रिपब्लिक पार्टी ने दलित मुस्लिम गठजोड़ के सहारे जातीय ध्रु्वीकरण किया तो जनसंघ एवं हिंदू महासभा ने मतदाताओं को रिझाने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया। इसमें जनसंघ भारी पड़ गया। जिले के मतदाता धार्मिक ध्रुवीकरण की हवा में जनसंघ के साथ बह गए। जिसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा।
जिले की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली कांग्रेस की दो बैलों की जोड़ी दीपक की लौ में झुलस गई। सहावर से वेदराम तथा कासगंज से गिरवर प्रसाद ने जिले को दीपक की लौ से प्रकाशित कर विधानसभा में कदम रखा। सिढ़पुरा में हिंदू महासभा ने कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी और कांग्रेस प्रत्याशी छोटेेलाल मात्र 81 वोटों से जीत हासिल कर पाए। जनसंघ प्रत्याशी लाखन सिंह 3907 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे। वहीं 1967 के चुनाव में जनसंघ ने सोरों की सीट पर जीत दर्ज की। इस सीट पर जनसंघ प्रत्याशी एस राम ने कांग्रेस प्रत्याशी एन राम को 4 वोटों से हरा दिया।
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वहीं कासगंज व पटियाली में कांग्रेस कड़े मुकाबले में जनसंघ प्रत्याशियों से हारते-हारते बची। दोनों विधान सभाओं में जनसंघ प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे। इसके बाद जनसंघ ने 1969 में धार्मिक ध्रुवीकरण के सहारे जिला की कासगंज व सोरों विधान सभा सीट पर कब्जा कर लिया। सोरों से सियाराम तथा कासगंज से नेतराम सिंह विधान सभा में पहुंचे। जबकि पटियाली में जनसंघ प्रत्याशी राजेंद्र सिंह तीसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस प्रत्याशी बनारसी दास को दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। इस सीट पर बीकेडी प्रत्याशी तिरमल सिंह को जीत हासिल हुई।
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विधान सभा के लिए 1952 में हुए पहले आम चुनाव में जनसंघ कोई खास असर नहीं दिखा सका। कासगंज वेस्ट से जनसंघ के प्रत्याशी भगवान सिंह 5वें स्थान पर तथा कासगंज नोर्थ में रामस्वरूप 7वें स्थान पर रहे। इसके बाद 1957 के चुनाव में इस पार्टी ने अपने वोट बैंक में सुधार किया तो कासगंज में हेमराज व सहावर में सूबेदार सिंह चौथे तथा सिढ़पुरा में हरीश चंद्र तीसर स्थान पर रहे। 1962 के चुनाव में जिले की सियासत का परिदृश्य एकदम से बदल गया। रिपब्लिक पार्टी ने दलित मुस्लिम गठजोड़ के सहारे जातीय ध्रु्वीकरण किया तो जनसंघ एवं हिंदू महासभा ने मतदाताओं को रिझाने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया। इसमें जनसंघ भारी पड़ गया। जिले के मतदाता धार्मिक ध्रुवीकरण की हवा में जनसंघ के साथ बह गए। जिसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा।
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जिले की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाली कांग्रेस की दो बैलों की जोड़ी दीपक की लौ में झुलस गई। सहावर से वेदराम तथा कासगंज से गिरवर प्रसाद ने जिले को दीपक की लौ से प्रकाशित कर विधानसभा में कदम रखा। सिढ़पुरा में हिंदू महासभा ने कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी और कांग्रेस प्रत्याशी छोटेेलाल मात्र 81 वोटों से जीत हासिल कर पाए। जनसंघ प्रत्याशी लाखन सिंह 3907 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे। वहीं 1967 के चुनाव में जनसंघ ने सोरों की सीट पर जीत दर्ज की। इस सीट पर जनसंघ प्रत्याशी एस राम ने कांग्रेस प्रत्याशी एन राम को 4 वोटों से हरा दिया।
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वहीं कासगंज व पटियाली में कांग्रेस कड़े मुकाबले में जनसंघ प्रत्याशियों से हारते-हारते बची। दोनों विधान सभाओं में जनसंघ प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे। इसके बाद जनसंघ ने 1969 में धार्मिक ध्रुवीकरण के सहारे जिला की कासगंज व सोरों विधान सभा सीट पर कब्जा कर लिया। सोरों से सियाराम तथा कासगंज से नेतराम सिंह विधान सभा में पहुंचे। जबकि पटियाली में जनसंघ प्रत्याशी राजेंद्र सिंह तीसरे स्थान पर रहे। कांग्रेस प्रत्याशी बनारसी दास को दूसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। इस सीट पर बीकेडी प्रत्याशी तिरमल सिंह को जीत हासिल हुई।