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ताज : एक साल तक नजर नहीं आएगा मुख्य गुंबद
ताज : एक साल तक नजर नहीं आएगा मुख्य गुंबद
Updated Tue, 17 Oct 2017 12:00 PM IST
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ताज : एक साल तक नजर नहीं आएगा मुख्य गुंबद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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ताजमहल का पीला पड़ चुका गुंबद एक साल तक नजर नहीं आएगा। मुख्य गुंबद को चमकाने के लिए मडपैक थेरेपी के दौरान यह चारों ओर से स्केफोल्डिंग (पाड़) से ढक जाएगा। दुनिया के सातवें अजूबे को तामीर होने के बाद पहली बार मुख्य गुंबद पर मडपैक लगाया जाएगा। इस पर लगे ब्रास के 9.29 मीटर ऊंचे कलश की भी पहली बार एएसआई साइंस ब्रांच केमिकल क्लीनिंग करेगी।
दीदार ए ताज के लिए आने वाले सैलानियों को एक साल तक सेल्फी लेने और फोटोग्राफी कराने में ताज का बैकग्राउंड खूबसूरत नजर नहीं आ पाएगा।
गुंबद पर इससे पहले 1940-41 में विश्व युद्ध के दौरान संरक्षण और सुरक्षा के लिए स्केफोल्डिंग लगाई गई थी, लेकिन मडपैक के लिए यह पहला मौका होगा। 75 साल बाद गुंबद वैसा ही नजर आएगा। गुंबद के साथ ही ब्रास के कलश को भी केमिकल ट्रीटमेंट कर साफ किया जाएगा। धूल, बारिश और रस्ट के कारण यह बदरंग हो चुका है। एएसआई ने स्पष्ट कर दिया है कि विश्व धरोहर ताज का रखरखाव पहली प्राथमिकता है, न कि पर्यटकों की सेल्फी। पीलेपन और ब्लैक कार्बन के दाग हटाने को मडपैक जरूरी है।
1874 में गुंबद के कलश पर चढ़ाया मुलम्मा
ब्रिटिश काल में 1874 में तत्कालीन एक्जीक्यूटिव इंजीनियर जेडब्ल्यू एलेंक्जेंडर ने ताजमहल में मुख्य गुंबद के संरक्षण पर 70,926 रुपये खर्च किए थे। तीन साल तक चले संरक्षण में गुंबद के टूटे पत्थरों को बदलने के साथ पच्चीकारी का काम कराया गया। गुंबद के ऊपर पिनेकल पर मुलम्मा चढ़ाया गया था। इसके बाद 1880 में तत्कालीन डीएम एफ बॉकर ने मेहमान खाने की ओर चमेली फर्श पर इसी कलश का काले ग्रेनाइट से छाया चित्र तैयार कराया।
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‘मीनारों के बाद अब दीवारों पर मडपैक लगाया जा रहा है। इसके बाद मुख्य गुंबद पर मडपैक कराया जाएगा। मडपैक के दौरान ही गुंबद पर संरक्षण का काम किया जाएगा। टूटे पत्थरों को बदलने के साथ प्वाइंटिंग जैसे काम भी कराए जाएंगे।’’
डा. भुवन विक्रम
अधीक्षण पुरातत्वविद्, एएसआई
स्केफोल्डिंग लगने से पहले होगी स्टडी
आगरा। ताजमहल की चारों मीनारों पर मडपैक के लिए लोहे की स्केफोल्डिंग लगाई गई, वही मुख्य गुंबद पर भी लगाई जाएगी। संगमरमरी स्मारक के मुख्य गुंबद पर स्केफोल्डिंग का लोड कहीं ज्यादा तो नहीं हो जाएगा, इसके लिए लोड वियरिंग कैपेसिटी की जांच की जाएगी। दरअसल, एक साल तक के लिए यह स्केफोल्डिंग लगी रहेगी। तीन से पांच महीनों का समय तो स्केफोल्डिंग बांधने में ही लग जाएगा। 250 फुट की ऊंचाई तक लोहे के पाइप पहुंचाना ही मुश्किल काम है।
दीदार ए ताज के लिए आने वाले सैलानियों को एक साल तक सेल्फी लेने और फोटोग्राफी कराने में ताज का बैकग्राउंड खूबसूरत नजर नहीं आ पाएगा।
गुंबद पर इससे पहले 1940-41 में विश्व युद्ध के दौरान संरक्षण और सुरक्षा के लिए स्केफोल्डिंग लगाई गई थी, लेकिन मडपैक के लिए यह पहला मौका होगा। 75 साल बाद गुंबद वैसा ही नजर आएगा। गुंबद के साथ ही ब्रास के कलश को भी केमिकल ट्रीटमेंट कर साफ किया जाएगा। धूल, बारिश और रस्ट के कारण यह बदरंग हो चुका है। एएसआई ने स्पष्ट कर दिया है कि विश्व धरोहर ताज का रखरखाव पहली प्राथमिकता है, न कि पर्यटकों की सेल्फी। पीलेपन और ब्लैक कार्बन के दाग हटाने को मडपैक जरूरी है।
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1874 में गुंबद के कलश पर चढ़ाया मुलम्मा
ब्रिटिश काल में 1874 में तत्कालीन एक्जीक्यूटिव इंजीनियर जेडब्ल्यू एलेंक्जेंडर ने ताजमहल में मुख्य गुंबद के संरक्षण पर 70,926 रुपये खर्च किए थे। तीन साल तक चले संरक्षण में गुंबद के टूटे पत्थरों को बदलने के साथ पच्चीकारी का काम कराया गया। गुंबद के ऊपर पिनेकल पर मुलम्मा चढ़ाया गया था। इसके बाद 1880 में तत्कालीन डीएम एफ बॉकर ने मेहमान खाने की ओर चमेली फर्श पर इसी कलश का काले ग्रेनाइट से छाया चित्र तैयार कराया।
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‘मीनारों के बाद अब दीवारों पर मडपैक लगाया जा रहा है। इसके बाद मुख्य गुंबद पर मडपैक कराया जाएगा। मडपैक के दौरान ही गुंबद पर संरक्षण का काम किया जाएगा। टूटे पत्थरों को बदलने के साथ प्वाइंटिंग जैसे काम भी कराए जाएंगे।’’
डा. भुवन विक्रम
अधीक्षण पुरातत्वविद्, एएसआई
स्केफोल्डिंग लगने से पहले होगी स्टडी
आगरा। ताजमहल की चारों मीनारों पर मडपैक के लिए लोहे की स्केफोल्डिंग लगाई गई, वही मुख्य गुंबद पर भी लगाई जाएगी। संगमरमरी स्मारक के मुख्य गुंबद पर स्केफोल्डिंग का लोड कहीं ज्यादा तो नहीं हो जाएगा, इसके लिए लोड वियरिंग कैपेसिटी की जांच की जाएगी। दरअसल, एक साल तक के लिए यह स्केफोल्डिंग लगी रहेगी। तीन से पांच महीनों का समय तो स्केफोल्डिंग बांधने में ही लग जाएगा। 250 फुट की ऊंचाई तक लोहे के पाइप पहुंचाना ही मुश्किल काम है।