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सेना की राह मिलेगी ‘सेना की पहुंच’ से
ब्यूरो, अमर उजाला अागरा।
Updated Thu, 30 Jul 2015 02:10 AM IST
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युद्ध तो युद्ध, शांतिकाल में भी सेना ने उसी शौर्य-साहस से देशसेवा का अप्रतिम इतिहास रचा है। सेना में शानदार करियर के अवसर भी हैं। छात्र जीवन से ही तमाम युवा सेना में जाने सपने बुनते हैं लेकिन कुछ शंका तो कुछ जानकारी के अभाव में यह साकार नहीं हो पाता। इसके ही समाधान के लिए सेना की मध्य कमान ने गत वर्ष ‘सेना की पहुंच’ अभियान छेड़ा। इस वर्ष भी इसे चलाया जा रहा है।
सेना की मध्य कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राजन बख्शी ने 2014 में ‘सेना की पहुंच’ की शुरूआत कराई थी। इसमें महिलाओं समेत चुनिंदा अधिकारियों को शामिल किया गया। लेफ्टिनेंट जनरल राजन ने खुद उन्हें प्रशिक्षण दिया कि वे स्कूलों में विद्यार्थियों से सीधा संवाद स्थापित कर उन्हें सेना के बारे में बताएं। ये अधिकारी 1999 में कारगिल युद्ध में सेना के अद्भुत रणकौशल की जानकारी रोचक तरीके से छात्रों तक पहुंचाते हैं। 2001 में भुज के भूकंप, 2004 की सुनामी, 2010 की लेह त्रासदी, 2013 की उत्तराखंड आपदा, 2014 की कश्मीर बाढ़, 2015 में नेपाल के भूकंप के दौरान राहत-बचाव में सेना ने कितनी कुशलता से मोर्चा संभाला यह भी वे बताते हैं। हाल ही में यमन में फंसे भारतीय और विदेशी नागरिकों को सुरक्षित निकालने की चुनौती भी बड़ी थी। भारतीय सेना ने हर मौके पर कुशलता और साहस का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही सेना में भर्ती अवसरों की जानकारी, इसके तरीके आदि भी छात्र जान पाते हैं। उनके सवालों पर ये अधिकारी उन्हें जवाब देकर संतुष्ट भी करते हैं।
जान लें, भारतीय सेना को करीब 40 प्रतिशत जवान और 45 प्रतिशत अधिकारी उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश से मिलते हैं। ‘सेना की पहुंच’ इन्हीं सात राज्यों में चल रहा है। पिछले साल करीब 72 कालेज और 87 स्कूलों के छात्रों से सैन्य अधिकारियों ने सीधा संवाद किया।
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सेना की मध्य कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल राजन बख्शी ने 2014 में ‘सेना की पहुंच’ की शुरूआत कराई थी। इसमें महिलाओं समेत चुनिंदा अधिकारियों को शामिल किया गया। लेफ्टिनेंट जनरल राजन ने खुद उन्हें प्रशिक्षण दिया कि वे स्कूलों में विद्यार्थियों से सीधा संवाद स्थापित कर उन्हें सेना के बारे में बताएं। ये अधिकारी 1999 में कारगिल युद्ध में सेना के अद्भुत रणकौशल की जानकारी रोचक तरीके से छात्रों तक पहुंचाते हैं। 2001 में भुज के भूकंप, 2004 की सुनामी, 2010 की लेह त्रासदी, 2013 की उत्तराखंड आपदा, 2014 की कश्मीर बाढ़, 2015 में नेपाल के भूकंप के दौरान राहत-बचाव में सेना ने कितनी कुशलता से मोर्चा संभाला यह भी वे बताते हैं। हाल ही में यमन में फंसे भारतीय और विदेशी नागरिकों को सुरक्षित निकालने की चुनौती भी बड़ी थी। भारतीय सेना ने हर मौके पर कुशलता और साहस का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही सेना में भर्ती अवसरों की जानकारी, इसके तरीके आदि भी छात्र जान पाते हैं। उनके सवालों पर ये अधिकारी उन्हें जवाब देकर संतुष्ट भी करते हैं।
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जान लें, भारतीय सेना को करीब 40 प्रतिशत जवान और 45 प्रतिशत अधिकारी उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिसा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश से मिलते हैं। ‘सेना की पहुंच’ इन्हीं सात राज्यों में चल रहा है। पिछले साल करीब 72 कालेज और 87 स्कूलों के छात्रों से सैन्य अधिकारियों ने सीधा संवाद किया।
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