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‘मां बचाओ’ अभियान छेडे़ंगे डाक्टर

Mon, 18 Jan 2016 01:56 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, आगरा
ब्यूरो, अमर उजाला, आगरा Updated Mon, 18 Jan 2016 01:56 AM IST
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save mother expedition
बेटियाें के बाद अब ‘मां बचाओ’ अभियान चलाने की भी जरूरत है। इसकी बड़ी वजह प्रसव दौरान 35 फीसदी महिलाओं की मौत है। लगातार बढ़ रही इस संख्या से डाक्टर भी चिंतित हैं। इसे रोकने में फेडरेशन ऑफ आब्स्टेट्रिकल एंड गाइनेकोलॉजी आफ इंडिया (फोग्सी) और आल इंडिया कांग्रेस ऑफ आब्स्टेट्रिक्स एंड गाइनेकोलॉजी (आईकोग) भी सरकार द्वारा की जा रही कोशिशों में सहयोगी बनेंगे। कलाकृति मैदान में पांच दिन तक चली आईकोग-2016 रविवार को हुई। इस दौरान 18 वर्कशाप और 35 पैनल डिस्कशन हुए जिसमें 90 विदेशी समेत छह हजार चिकित्सकों ने हिस्सा लिया।
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आईकोग-2016 के समापन पर फोग्सी अध्यक्ष डा. अल्का कृपलानी ने बताया कि 60-70 फीसदी महिलाएं  खून की कमी का शिकार हैं। सर्वाइकल और ब्रेस्ट कैंसर जैसे खतरे भी हैं। उन्हें गर्भावस्था में बेहतर खानपान, आयरन-कैल्शियम और टीकाकरण का महत्व समझाया जाएगा। सर्वाइकल कैंसर के प्रति जागरूकता के लिए स्कूल-कालेज में समाजसेवी संस्थाओं के सहयोग से संगोष्ठियां आयोजित की जाएंगी। आईकोग के संयोजक डा. नरेंद्र मल्होत्रा ने बताया कि सर्वाइकल कैंसर से हर एक मिनट में आठ महिला की मौत होती है। इससे बचाव के लिए वैक्सीन उपलब्ध है। उनकी संस्था केंद्र सरकार से वैक्सीनेशन को स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल करने की मांग करेगी। शहर और गांव में सरकारी संस्थानों में प्रसव की बेहतर चिकित्सकीय सेवा मिले, इसका जिम्मा पब्लिक प्राइवेट पाटर्नरशिप के तहत निजी डाक्टरों को देने की भी सिफारिश की जाएगी। समारोह में मुख्य रूप से आयोजन सचिव डा. जयदीप मल्होत्रा, साइंटिफिक सेशन अध्यक्ष डा. सरोज सिंह, डा. अनुपम गुप्ता, डा. संध्या बंसल, डा. आरएन गोयल, डा. अनू पाठक, डा. नेहा अग्रवाल आदि उपस्थित रहीं।
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फ्लेवर्ड कंडोम से संक्रमण का खतरा
फ्लेवर्ड कंडोम का इस्तेमाल से बैक्टीरियल इन्फेक्शन (संक्रमण) का खतरा है। इसका इस्तेमाल करने वाले 8 से 10 फीसदी लोग इसका शिकार भी हो रहे हैं। लगातार प्रयोग से यह खतरा 40 फीसदी तक बढ़ जाता है। आईकोग-2016 के अंतिम दिन ‘सेक्स एजूकेशन इन इंडिया: नीड आफ द आवर’ विषय पर हुए पैनल डिस्कशन में यह बात सामने आई।
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डिस्कशन में देशभर से आए विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। वरिष्ठ चिकित्सक डा. मुकेश चंद्रा ने बताया कि फ्लेवर्ड कंडोम में सैकरीन, एस्पाटैम जैसे तत्व होते हैं, जिसमें ग्लूकोज की मात्रा काफी रहती है। इससे फंगल इन्फेक्शन हो रहे हैं। उन्होंने कंडोम के पैकेट पर इसकी चेतावनी छापने की जरूरत बताई। सेक्स शिक्षा पर डा. रंजू अग्रवाल ने कहा कि अधूरी जानकारी नुकसानदेह होती है। किशोर-किशोरियां को सही जानकारी मिले, यह जिम्मेदारी अभिभावकों के साथ शिक्षक-डाक्टरों को उठानी होगी। इस उम्र में शारीरिक संबंधों की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए डा. अजय माने ने इंटरनेट पर उपलब्ध अश्लील सामग्री और मां-बाप द्वारा बच्चों को पर्याप्त समय न देना बड़ी वजह बताया।

एसएन कालेज को मिलीं दो एलबीडब्ल्यू किट
कांफ्रेंस संयोजक डा. नरेंद्र मल्होत्रा ने बताया कि प्रसव दौरान अधिक रक्तस्राव से होने वाली मौत रोकने में कारगर लेटेस्ट लाइफ बॉडी रैप (एलबीडब्ल्यू) की दो किट एसएन मेडिकल कालेज की गायनिक विभागाध्यक्ष डा. सरोज सिंह को प्रदान की गई हैं। इसका सामान्य प्रसव में इस्तेमाल किया जाता है। इसमें पांच-पांच बेल्ट होती हैं, जो पेट, कूल्हे और पैरों पर लगाई जाती हैं। सामान्य तौर पर प्रसव के बाद 3-5 मिनट में रक्तस्राव बंद हो जाता है। ऐसा न होने पर किट के जरिए 4-5 घंटे तक स्थिति को नियंत्रित रखा जा सकता है। इलाज के लिए यह समय काफी अहम होता है। 
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