रक्षाबंधन 2021: दिनभर शुभ मुहूर्त में बंधेगी राखी, पूर्णिमा तिथि पर पंचक का प्रभाव नहीं, जानिए ज्योतिषाचार्य के बताए योग
सावन मास की पूर्णिमा को भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में रक्षाबन्धन का पर्व आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए मनाया जाता है। पूर्ण चन्द्र पूर्णिमा को ही रहता है और पूर्णिमा तिथि के देवता चंद्रमा हैं इसलिए रक्षा बंधन के लिए पूर्णिमा तिथि उचित है।
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रक्षा का पर्व रक्षाबंधन, इस वर्ष शोभन, अमृत व गजकेसरी योग में मनेगा। भद्रा का साया और पंचक का कोई प्रभाव नहीं होगा। राखी दिनभर शुभ मुहूर्त में बंधेगी, ये कहना है आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक, शोध निदेशक, भारद्वाज ज्योतिष एवं आध्यात्मिक शोध संस्थान, इंदौर का। आचार्य ने बताया कि इंद्र को बृहस्पति व इंद्राणी ने रक्षा सूत्र बांधा था। सावन मास की पूर्णिमा को भद्रा रहित शुभ मुहूर्त में रक्षाबन्धन का पर्व आयु और आरोग्य की वृद्धि के लिए मनाया जाता है। पूर्ण चन्द्र, पूर्णिमा को ही रहता है और पूर्णिमा तिथि के देवता चंद्रमा हैं इसलिए रक्षा बंधन के लिए पूर्णिमा तिथि उचित है।
आचार्य ने बताया कि रक्षापर्व श्रवण नक्षत्र में मनाया जाता है लेकिन इस वर्ष 22 अगस्त रविवार को धनिष्ठा में मनेगा। शोभन, अमृत व गजकेसरी महा योग इस पर्व की शोभा बढ़ाएंगे। पूर्णिमा तिथि शाम पांच बजकर 31 मिनट तक रहेगी। शोभन योग प्रातः 10.38 बजे तक रहेगा, अमृत योग सुबह 5.45 से शाम 5.32 तक रहेगा। मकर-कुंभ राशि का चंद्रमा, सिंह राशि का सूर्य व कुंभ राशि के बृहस्पति में बहनें अपने अपने भाई की कलाई पर आयु व आरोग्य की कामना से रक्षा बांधेंगीं।
इस वर्ष रक्षापर्व पर भद्रा का साया नहीं
सामान्यतः भद्रा काल में रक्षा बंधन वर्जित है, भद्रा प्रातः छह बजकर 16 मिनट तक है, इसके बाद पूरे दिनभर शुभ मुहूर्त है। बताते हैं कि भद्रा में रक्षा बंधन से राजा का अनिष्ठ होता है। इंद्र को देवराज बृहस्पति व इंद्राणी ने अभिमंत्रित रक्षासूत्र युद्ध में विजयी होने के लिए बांधा था। आजकल बहनों द्वारा अपने भाई की कलाई में राखी बांधी जाती हैं लेकिन इंद्राणी ने इंद्र को रक्षा बांधी थी, इसके चलते मध्यकाल में इस प्रथा को और ज्यादा बल मिला।
रक्षासूत्र कैसे तैयार करें और किस मंत्र से रक्षा बंधन करें
आचार्य पंडित रामचन्द्र शर्मा वैदिक ने रक्षा सूत्र तैयार करने की विधि बताते हुए बताया कि सावन पूर्णिमा को स्नान आदि कर्म से निवृत्त होकर शुभ मुहूर्त में कुल परम्परा अनुसार श्री गणेशजी व कुल देवता का स्मरण कर रक्षा सूत्र बनाने की परंपरा है। ऊनी, सूती अथवा रेशमी पीला कपड़ा लेकर उसमें सरसों, केशर, चन्दन, अक्षत, दूर्वा रख बंधन तैयार किया जाता है। यह रक्षासूत्र कहलाता है। एक चौकी पर कलश स्थापित कर उस पर रक्षासूत्र की सविधि गन्ध, अक्षत पुष्प आदि से पूजन कर ओम येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रोमहा बलः तेन त्वामनु बध्नामि रक्षे मा चल मा चल इस मंत्र से दाहिने हाथ मे रक्षा सूत्र बांधने से आयु और आरोग्य की वृद्धि होती है। आचार्य शर्मा ने बताया कि श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को विधि-विधान से रक्षासूत्र तैयार कर स्वस्ति वाचन के साथ इंद्राणी ने इंद्र को युद्ध मे विजयी होने की भावना से स्वस्ति महामंत्र से रक्षा सूत्र बांधा था। तब से आज तक यह परम्परा रक्षाबंधन के नाम से चली आ रही है। रक्षाबन्धन प्रात: 6.16 के बाद पूरे दिन शुभ मुहूर्त में कर सकते है।