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UP: बेजुबान का दर्द भी समझिए! 'वह कार कौन-सी है, जो मुझे मेरे घर ले जाएगी'...ये घटना झकझोर देगी
Mon, 06 Oct 2025 03:06 PM IST
धीरेन्द्र सिंह
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Mon, 06 Oct 2025 03:06 PM IST
सार
यमुना एक्सप्रेस-वे पर छोड़े गए जर्मन शेफर्ड की ये घटना आपका भी दिल झकझोर देगी। एक सवाल सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि जो जर्मन शेफर्ड के साथ जो हुआ, वो क्या सही है। पढ़ें अमर उजाला के संपादक भूपेंद्र कुमार द्वारा देखे गए इस दृश्य का ये लेख...
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : chatgpt ai
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विस्तार
वह अगस्त की एक बरसाती शाम थी, यमुना एक्सप्रेस-वे पर तेजी से दौड़ती गाड़ियों के बीच दूर से वह एक काला धब्बा-सा नजर आ रहा था। छह या सात माह का काला-भूरा जर्मन शेफर्ड कारों के पीछे आड़ा-तिरछा दौड़ रहा था। इस कोशिश में कई बार वह कारों से टकराते-टकराते बचा। उसे शायद उम्मीद थी कि इन्हीं में से कोई कार उसके मालिक की होगी। वे कार रोकेंगे और उसे वापस घर ले जाएंगे। पर शायद इन्सान की दुनिया में इन्सानियत नहीं है। इस प्यारे से डॉग को उसके मालिक ने बीमार होने या किंसी और वजह से यमुना एक्सप्रेस-वे पर मथुरा टोल प्लाजा के पास छोड़ दिया।
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यह सिर्फ उस अकेले जर्मन शेफर्ड की सच्चाई नहीं है। शौक शौक में महंगी खरीद तो कीमत पर विदेशी नस्ल के श्वानों की होती है, पर बहुत कम लोग ऐसे होते हैं, जो इस जिम्मेदारी को उठा पाते हैं। उन्हें तो बस अपने बच्चों के लिए एक खिलौना चाहिए होता है। एक अनुमान के तहत, देश भर में हजारों कुत्तों को उनके मालिक सड़कों पर छोड़ जाते हैं। इनमें दस फीसदी विदेशी नस्ल के शहरी पालतू कुत्ते होते हैं। फेडरेशन ऑफ इंडियन एनिमल प्रोटेक्शन ऑर्गनाइजेशंस के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच साल में शहरों में पालतू कुत्तों को छोड़ने की प्रवृत्ति में 50 फीसदी तक इजाफा हुआ है।
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1960 के प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी एक्ट के अनुसार, किसी पालतू जानवर को लावारिस छोड़ना अपराध है, दोषी पाए जाने पर सजा और जुर्माने का प्रावधान है। तो फिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है? असल में किसी पिल्ले को अपनाना एक बड़ी जिम्मेदारी है, जिसका एहसास शौक-शौक में खरीदने वालों को उस वक्त नहीं होता। समय से टीका लगवाना, वेटरनरी हॉक्टरों को दिखाना, बाहर टहलाने ले जाना और सबसे जरूरी समय देना। कोविड के समय घर में बोर हो रहे लोगों ने बड़ी संख्या में कुत्तों को खरीदा या गोद लिया, पर कोविड बीतते ही ज्यादातर को सड़कों पर यों ही छोड़ दिया गया। आगरा में कैस्पर होम डॉग शेल्टर चलाने वाली विनीता अरोड़ा कहती हैं कि इस समस्या का समाधान माइक्रो चिप में है।
इससे कुत्ते के मालिक के बारे में पता चल सकेगा और उस पर कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। ज्यादातर लोग बीमार कुत्तों को छोड़ देते हैं। नोएडां में डिस्पेंसरी फॉरै स्ट्रे एनिमल चलाने वाले संजय महापात्र कहते हैं कि कुत्तों को पालने का फैसला लोग सोच-समझकर नहीं करते। उनके पास माह में 15 से 20 छोड़े गए कुत्ते आते हैं। इन्हें संभालना बहुत मुश्किल होता है। हर आहट पर उन्हें लगता है कि उनके मालिक लेने आए हैं। यही शायद यमुना एक्सप्रेस-वे पर गाड़ियों के पीछे भाग रहे उस जर्मन शेफर्ड ने भी सोचा होगा। 1960 के प्रिवेंशन ऑफ क्रुएल्टी एक्ट के अनुसार, किसी पालतू जानवर को लावारिस छोड़ना अपराध है।