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इन समस्याओं से भी चाहिए आजादी, कुछ ऐसा है सुहागनगरी का हाल

Wed, 15 Aug 2018 06:55 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला फिरोजाबाद
न्यूज डेस्क, अमर उजाला फिरोजाबाद Updated Wed, 15 Aug 2018 06:55 AM IST
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people wants freedom these problems on independence day
खस्ताहाल रोड - फोटो : अमर उजाला
सुहागनगरी की 25 लाख से अधिक जनता आज भले ही आजादी की वर्षगांठ मना रही है। जिले के विकास पर करोड़ों का बजट भी खर्च हुआ, विकास का पहिया भी सरपट दौड़ा। लेकिन प्रशासनिक अफसरों की बेरुखी के चलते आजादी के 71 साल बाद भी समस्याओं की बेड़ियां नहीं टूट सकीं। लाखों की आबादी आज भी सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं को तरस रही है।  
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जाम से कब मिलेगी आजादी 
शहर को जाम के झाम से निजात दिलाने को अफसरों से लेकर व्यापारियों ने प्लानिंग तो कई बार बनाई, लेकिन कागजों से बाहर इस समस्या का कोई हल दिखाई नहीं दिया। सात लाख से अधिक आबादी वाले शहर के वाशिंदे जाम की समस्या से जूझते दिखाई देते हैं। क्या सर्विस रोड, क्या सदर बाजार, प्रमुख चौराहे हर जगह तो सिर्फ जाम दिखाई देता है।  
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भेदभाव की सोच नहीं बदली
बेटा-बेटियों में भेदभाव की सोच 21 वीं सदी में भी खत्म नहीं हुई। पिछले दिनों थाना उत्तर के गांधी नगर में एक मासूम को उसके पिता ने जमीन पर ऐसा पटका कि उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई, कई महिलाओं को आज भी बेटियां को जन्म देने पर अपमानित होना ही पड़ रहा है। 
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कब बदलेगा थानों का रवैया 
पुलिस के आला अधिकारी भले थाने आने वाले फरियादियों से मित्रवत व्यवहार रखने की सीख देते हों, लेकिन एक बार यदि थाने में काम जाए तो वहां बैठे मुंशी और दरोगा जी के व्यवहार पुलिस की हकीकत बता देता है। यही कारण है कि थाने चौकी जाने से लोग बचते हैं। यदि कोई समझदार व्यक्ति जाए तो उल्टा फंसाने की कोशिश करने में पुलिस चूकती नहीं। 

रोशनी देखने को तरस रहे ग्रामीण 
अभी तक 2049 मजरों में विद्युतीकरण नहीं हो सका। लाखों ग्रामीण सालों बाद भी अंधेरे की गुलामी से आजाद नहीं हो सके। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी सौभाग्य योजना से इन गांवों तक बिजली पहुंचाने की तैयारी हो चुकी है। अधीक्षण अभियंता एके वर्मा ने बताया कि 2049 मजरों में ट्रांसफार्मर लगवाकर घरों तक बिजली पहुंचाई जाएगी। इसके लिए सर्वे कार्य पूरा हो चुका है।  
 
13 ग्रामसभा, नई आबादी को विकास का इंतजार 
सुहागनगरी में लाखों की आबादी आजादी के सालों बाद भी विकास की किरण देखने को तरस रही है। नगर निगम सीमा से सटी 13 ग्रामसभा व नई आबादी के क्षेत्रों में आजादी से लेकर अबतक सड़क, नाली, खरंजा तक नहीं बने। सड़कों में गंदगी व जलभराव की गंभीर समस्या से लाखों की आबादी जूझ रही है। अधिशासी अभियंता विकास कुरील का कहना है कि नगर निगम सीमा के अंतर्गत करीब 45 किलोमीटर सड़कें आज भी कच्ची हैं, परंतु बजट के  अभाव में सड़कों का निर्माण नहीं हो पा रहा।  

बालश्रम का दाग 
आसपास के गांव के 4550 परिवारों के सर्वे में 8781 बालश्रमिक काम करने को विवश हैं। 4492 बालक और 4289 बालिकाएं हैं। 7572 खतरनाक व 1209 सामान्य रूप से काम कर रहे हैं। 3887 बाल श्रमिक ऐसे हैं, जिन्होंने अभी तक स्कूल का मुंह नहीं देखा।  

खारे पानी की समस्या बरकरार  
आधा सैकड़ा से अधिक गांवों में खारे पानी की गंभीर समस्या है, जो आजादी के सालों बाद भी दूर नहीं हो सकी। खारा पानी पीने से सैकड़ों ग्रामीण दांत खराब होने, घुटनों में दर्द, चेहरे पर सूजन जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। जलनिगम एक्सईएन चंद्रमोहन सोलंकी का कहना है कि नारखी ब्लाक में खारे पानी की समस्या के लिए सर्वे कराया गया था। समस्या दूर करने 12 करोड़ का प्रस्ताव भेजा, परंतु शासन से आजतक बजट नहीं मिला।  
 
ट्रांसपोर्ट नगर का खत्म नहीं हुआ इंतजार  
सालों से ट्रांसपोर्ट नगर योजना की मांग उठ रही है। विकास प्राधिकरण ने वर्ष 2008 में ट्रांसपोर्ट नगर योजना का प्रस्ताव तैयार किया। किसानों के चार गुना मुआवजा की मांग पर प्राधिकरण ने प्रस्ताव वापस ले लिया। योगी सरकार में ट्रांसपोर्ट नगर योजना की उम्मीद बरकरार है। आश्वासन समिति की बैठक में ट्रांसपोर्ट नगर का मुद्दा रखा था। 

जर्जर स्कूलों से नहीं मिली मुक्ति 
आजादी के बाद शिक्षा का अधिकार के लिए कानून बन गया। मगर बच्चे आज भी अपनी जान जोखिम में ड़ालकर जर्जर स्कूलों में पढ़ते हैं। शहरी क्षेत्र में किराए गए भवन हैं। शासन भी बच्चों के लिए सुरक्षित भवन बनाने की पहल नहीं कर रहा है। बीएसए अरविंद पाठक ने बताया कि नगर क्षेत्र के स्कूलों का मामला कोर्ट में चल रहा है। वहीं, शासन को भी लगातार अवगत करा रहे हैं। 
 
सूचना के अधिकार का नहीं होता पालन 
सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के लागू होने के बाद हर किसी को उम्मीद थी कि हर सूचना कानून बनने के बाद आसानी से मिल जाएगी, लेकिन इसका पालन विभाग कम ही करते हैं। सूचनाएं मांगने वाले महीनों तक विभाग के ही चक्कर लगाते हैं। मामला आयोग में पहुंचने पर आधी अधूरी सूचनाएं देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। इस तरह के नजारा जिले के प्रमुख कार्यालयों में देखे जा सकते हैं।
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