पर्यटक अपार-धरोहरें बेहाल: 'अजूबे' के शहर में एक ऐसी लाइब्रेरी, जिसमें एक भी पुस्तक नहीं
- आगरा की दारा शिकोह की लाइब्रेरी में एक भी पुस्तक नहीं
- इमारत में चल रहा विद्यालय, लाइब्रेरी का प्रचार प्रसार भी नहीं
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आगरा के मोतीगंज स्थित दारा शिकोह की लाइब्रेरी में एक भी पुस्तक नहीं है। गेट पर लाइब्रेरी का बोर्ड तो लगा है जिस पर ‘अद्भुत विरासत-अनूठे अनुभव’ लिखा है लेकिन इमारत में कन्हई राम बाबूराम उच्चतर माध्यमिक विद्यालय चल रहा है। यहां की पुस्तकें पटना, पानीपत और रामपुर की लाइब्रेरी में भेज दी गई थीं। उन्हें वापस लाने की कोशिश नहीं की गई। आसपास कोई बोर्ड भी नहीं लगा है, जिससे पता चल सके कि लाइब्रेरी कहां है।
पांच साल पहले कम प्रचारित स्मारकों तक सैलानियों को पहुंचाने के लिए इनके प्रचार प्रसार की योजना बनी थी। इनमें दाराशिकोह की लाइब्रेरी भी शामिल थी। योजना के तहत ही यहां बोर्ड लगाया गया लेकिन इसके बाद ध्यान नहीं दिया। प्रचार प्रसार भी नहीं हुआ। विद्यालय की प्रधानाचार्य डॉ. रचना शर्मा ने बताया कि इतिहास में रुचि रखने वाले लोग कभी कभार यहां लाइब्रेरी की तलाश में आते हैं, लेकिन पुस्तकें न मिलने पर लौट जाते हैं। सात साल पहले ताज साहित्य उत्सव के तहत यहां एक आयोजन भी हुआ, जिसमें दारा शिकोह के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डाली गई। यह भी दोबारा नहीं हुआ।
उपनिषदों का फारसी में किया था अनुवाद
इतिहासकार राज किशोर राजे ने बताया कि दाराशिकोह मुगल बादशाह शाहजहां और बेगम मुमताज महल के ज्येष्ठ पुत्र थे। शाहजहां ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। उन्हें शहजादा बुलंद इकबाल नाम दिया था। शाहजहां के शासनकाल में यह लाइब्रेरी साहित्यक एवं बौद्धिक संपदा का केंद्र थी।
दारा फारसी, उर्दू और संस्कृत के विद्वान थे। उन्होंने उपनिषदों का संस्कृत से फारसी में अनुवाद इसी लाइब्रेरी में कराया था। सत्ता संघर्ष में उनके भाई औरंगजेब ने उन्हें हरा दिया। इसके बाद लाइब्रेरी में आग लगा दी गई। जलने से बची किताबें बाद में खुदाबख्श लाइब्रेरी पटना, मौलाना अल्ताफ हुसैन होली ओरिएंटल लाइब्रेरी पानीपत और राजा लाइब्रेरी रामपुर में भेज दी गईं।
अंग्रेजों ने बनाया था चुंगी का दफ्तर
इतिहासकार सुगम आनंद ने बताया कि 1810 के बाद यह परिसर ईस्ट इंडिया कंपनी को हुए घाटे की भरपाई के लिए नीलाम होते-होते बचा। आगरा में हाईकोट की स्थापना के बाद इसका उपयोग उससे संबंधित कार्यालय के रूप में किया गया। बाद में कुछ और कार्यालय भी इसमें चले। 1903 से इसमें आगरा नगर पालिका का चुंगी कार्यालय संचालित रहा।
जंग ए आजादी का गवाह है अहाता
लाइब्रेरी के बाहर एक अहाता है, जिसे चुंगी मैदान के रूप में जाना जाता है। नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, सरीखे नेताओं की बैठक यहां हुई। अंग्रेजो भारत छोड़ो, विदेशी कपड़ों की होली, नमक सत्याग्रह जैसे आंदोलन इसी मैदान में हुए। वर्तमान में भी 15 अगस्त और 26 जनवरी को जुलूस फुलट्टी चौक से यहां तक निकाले जाते हैं।