{"_id":"627eb8df10b93b2b76165c35","slug":"more-than-100-species-of-migratory-birds-come-to-agra-agra-news-agr5334376183","type":"story","status":"publish","title_hn":"आगरा में 100 से ज्यादा प्रजातियों के प्रवासी पक्षी डालते हैं डेरा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आगरा में 100 से ज्यादा प्रजातियों के प्रवासी पक्षी डालते हैं डेरा
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
आगरा। प्रवासी पक्षियों को आगरा की आबोहवा खूब भाती है। प्रति वर्ष यहां 100 से ज्यादा प्रजातियों के प्रवासी पक्षी डेरा डालते हैं। सूर सरोवर बर्ड सेंक्चुअरी, कीठम के पक्षियों पर शोध कार्य कर रही डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय की पीएचडी छात्रा निधि यादव और हिमांशी सागर के मुताबिक सर्दियों के प्रवास पर आगरा में सबसे अधिक वेटलैंड्स पर निर्भर डक, वेडर व शोर बर्ड की प्रजातियों के पक्षी आते हैं।
शोधार्थियों के मुताबिक वर्ष भर के माइग्रेशन के दौरान सबसे बड़े प्रवासी पक्षी के रूप में ग्रेट व्हाइट पेलिकन, डालमेशन पेलिकन और फ्लेमिंगो आते हैं। आगरा में सबसे छोटे प्रवासी पक्षियों में लिटिल स्टिंट, सेन्डपाइपर और वेगटेल देखी गई हैं। बॉयोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी (बीआरडीएस) के पक्षी विशेषज्ञ डॉ. केपी सिंह ने बताया कि अप्रैल से मई के बीच आगरा का मौसम गर्म होने लगता है, सर्दियों के प्रवास पर आए प्रवासी पक्षी वापस लौटने लगते हैं। मई-जून और पूर्व मानसून के समय में स्थानीय प्रवासी पक्षी भी आगरा में देखे जाते हैं। कम दूरी तय करके आने वाले स्थानीय प्रवासी पक्षियों की पैराडाइज फ्लाईकैचर, इंडियन पिट्टा, गोल्डन ओरिओल, पेंटेड स्टार्क, यूरेशियन स्पून-बिल प्रजातियां हैं।
बीआरडीएस के पक्षी गाइड गजेंद्र सिंह व महेंद्र सिंह के मुताबिक आगरा में गिद्ध की प्रजातियां भी दिख रही हैं। इजिप्सियन वल्चर (गिद्ध) के अलावा आगरा में दो वर्षों से लगातार हिमालय ग्रिफन वल्चर भी देखे गए हैं। साल 2021 में 11 और 2022 में 9 हिमालय ग्रिफन गिद्ध आगरा और भरतपुर के सीमावर्ती क्षेत्रों में देखे गए। वर्ष 2022 में एक सिनेरियस गिद्ध भी देखा गया। यह गिद्ध भरतपुर के केवलादेव नेशनल पार्क के प्रवास पर आते हैं।
विज्ञापन
जोधपुर झाल के पक्षियों पर शोध कर रहे विश्वविद्यालय के शोधार्थी समी सईद के मुताबिक, सबसे पहले अप्रैल माह में आगरा में रोजी स्टर्लिंग का आगमन होता है। इन्हीं दिनों में चंबल क्षेत्र में इंडियन स्कीमर प्रजनन करता है। मानसून पूर्व जून-जुलाई में जैकोबिन कूको दिखाई देने लग जाता है। पूर्व मानसून काल में फिजेंट टेल्ड जेकाना जोधपुर झाल और यूरेशियन स्पून-बिल प्रजनक प्रवास पर सूर सरोवर बर्ड सैंक्चुअरी पहुंचता है। जुलाई-अगस्त में बारिश के मौसम में व्हाइट वेगटेल व व्हाइट ब्राउडेड वेगटेल आगरा पहुंच जाती हैं।
डॉ. केपी सिंह का कहना है कि फ्लाई-वे एक भौगोलिक क्षेत्र होता है जिसके अंतर्गत प्रवासी प्रजातियों के समूह अपने वार्षिक चक्र प्रजनन, मॉलिंग, स्टेजिंग और गैर-प्रजनन को पूरा करते हैं। माइग्रेशन फ्लाई-वे की सीमाओं के अंतर्गत शिकारियों से पक्षियों की सुरक्षा, वेटलैंड्स (आर्द्र भूमि) का संरक्षण करना, स्थलीय आवासों व जंगलों को बचाना होगा। 40 फीसदी से अधिक प्रजातियां वेटलैंड्स पर पूरी तरह से निर्भर रहती हैं।
साइबेरिया समेत यूरोप और एशिया के देशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों को चंबल की वादियां रास आ रही हैं। इंडियन स्कीमर, रुडी शेल्डक, ब्लैक बैलीड टर्न, रिवर टर्न आदि पक्षी चंबल में प्रजनन करने लगे हैं। इधर एक पक्षी ने चंबल से मुंह मोड़ा भी है। पिछले दो साल से यहां की वादियों में फ्लेमिंगो ने दस्तक नहीं दी है।
बाह के रेंजर आरके सिंह राठौड ने बताया कि सर्दी के ढलान पर चंबल में आने वाले लंबी गर्दन, छड़ी जैसे पैरों और गुलाबी या लाल रंग के पंखों के फ्लेमिंगो दो साल से नहीं आए हैं। सूर सरोवर पक्षी विहार में भी चार फ्लेमिंगो का समूह उड़ान भरते हुए नजर आया था, लेकिन यह सर्दियों में यहां रुका नहीं।
विज्ञापन
शोधार्थियों के मुताबिक वर्ष भर के माइग्रेशन के दौरान सबसे बड़े प्रवासी पक्षी के रूप में ग्रेट व्हाइट पेलिकन, डालमेशन पेलिकन और फ्लेमिंगो आते हैं। आगरा में सबसे छोटे प्रवासी पक्षियों में लिटिल स्टिंट, सेन्डपाइपर और वेगटेल देखी गई हैं। बॉयोडायवर्सिटी रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी (बीआरडीएस) के पक्षी विशेषज्ञ डॉ. केपी सिंह ने बताया कि अप्रैल से मई के बीच आगरा का मौसम गर्म होने लगता है, सर्दियों के प्रवास पर आए प्रवासी पक्षी वापस लौटने लगते हैं। मई-जून और पूर्व मानसून के समय में स्थानीय प्रवासी पक्षी भी आगरा में देखे जाते हैं। कम दूरी तय करके आने वाले स्थानीय प्रवासी पक्षियों की पैराडाइज फ्लाईकैचर, इंडियन पिट्टा, गोल्डन ओरिओल, पेंटेड स्टार्क, यूरेशियन स्पून-बिल प्रजातियां हैं।
विज्ञापन
बीआरडीएस के पक्षी गाइड गजेंद्र सिंह व महेंद्र सिंह के मुताबिक आगरा में गिद्ध की प्रजातियां भी दिख रही हैं। इजिप्सियन वल्चर (गिद्ध) के अलावा आगरा में दो वर्षों से लगातार हिमालय ग्रिफन वल्चर भी देखे गए हैं। साल 2021 में 11 और 2022 में 9 हिमालय ग्रिफन गिद्ध आगरा और भरतपुर के सीमावर्ती क्षेत्रों में देखे गए। वर्ष 2022 में एक सिनेरियस गिद्ध भी देखा गया। यह गिद्ध भरतपुर के केवलादेव नेशनल पार्क के प्रवास पर आते हैं।
विज्ञापन
जोधपुर झाल के पक्षियों पर शोध कर रहे विश्वविद्यालय के शोधार्थी समी सईद के मुताबिक, सबसे पहले अप्रैल माह में आगरा में रोजी स्टर्लिंग का आगमन होता है। इन्हीं दिनों में चंबल क्षेत्र में इंडियन स्कीमर प्रजनन करता है। मानसून पूर्व जून-जुलाई में जैकोबिन कूको दिखाई देने लग जाता है। पूर्व मानसून काल में फिजेंट टेल्ड जेकाना जोधपुर झाल और यूरेशियन स्पून-बिल प्रजनक प्रवास पर सूर सरोवर बर्ड सैंक्चुअरी पहुंचता है। जुलाई-अगस्त में बारिश के मौसम में व्हाइट वेगटेल व व्हाइट ब्राउडेड वेगटेल आगरा पहुंच जाती हैं।
डॉ. केपी सिंह का कहना है कि फ्लाई-वे एक भौगोलिक क्षेत्र होता है जिसके अंतर्गत प्रवासी प्रजातियों के समूह अपने वार्षिक चक्र प्रजनन, मॉलिंग, स्टेजिंग और गैर-प्रजनन को पूरा करते हैं। माइग्रेशन फ्लाई-वे की सीमाओं के अंतर्गत शिकारियों से पक्षियों की सुरक्षा, वेटलैंड्स (आर्द्र भूमि) का संरक्षण करना, स्थलीय आवासों व जंगलों को बचाना होगा। 40 फीसदी से अधिक प्रजातियां वेटलैंड्स पर पूरी तरह से निर्भर रहती हैं।
साइबेरिया समेत यूरोप और एशिया के देशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों को चंबल की वादियां रास आ रही हैं। इंडियन स्कीमर, रुडी शेल्डक, ब्लैक बैलीड टर्न, रिवर टर्न आदि पक्षी चंबल में प्रजनन करने लगे हैं। इधर एक पक्षी ने चंबल से मुंह मोड़ा भी है। पिछले दो साल से यहां की वादियों में फ्लेमिंगो ने दस्तक नहीं दी है।
बाह के रेंजर आरके सिंह राठौड ने बताया कि सर्दी के ढलान पर चंबल में आने वाले लंबी गर्दन, छड़ी जैसे पैरों और गुलाबी या लाल रंग के पंखों के फ्लेमिंगो दो साल से नहीं आए हैं। सूर सरोवर पक्षी विहार में भी चार फ्लेमिंगो का समूह उड़ान भरते हुए नजर आया था, लेकिन यह सर्दियों में यहां रुका नहीं।