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'डिजिटल एडिक्शन' का युवाओं पर पड़ रहा दुष्प्रभाव, सामने आ रहे यह नतीजे
Sun, 22 Sep 2019 03:16 PM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Sun, 22 Sep 2019 03:16 PM IST
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डिजिटल एडिक्शन से युवा चिड़चिड़े और गुस्सैल हो रहे हैं। सबसे ज्यादा प्रभाव मोबाइल डाल रहा है। फतेहाबाद रोड स्थित होटल में चल रहे इंडियन एसोसिएशन ऑफ बायलॉजिकल साइकियाट्री के राष्ट्रीय अधिवेशन में विशेषज्ञों ने व्याख्यान दिए। बताया कि 65 फीसदी युवा छह से नौ घंटे तक मोबाइल पर फेसबुक, यू-ट्यूब देख रहे हैं।
यह भी पढ़ें : पोर्न की लत से बढ़ रहा लोगों में गुस्सा, डरावने हैं तथ्य, यह बदलाव दिखें तो हो जाएं सावधान
अधिवेशन के दूसरे दिन डॉ. काश्यपी ने कहा कि देश के चुनिंदा शहरों में 18-30 साल की उम्र्र के छात्र और युवाओं पर स्टडी की। इसमें इंजीनियरिंग, डिग्री कॉलेज और कामकाजी युवा रहे। स्टडी में पाया कि यह 24 घंटे में छह से नौ घंटे तक मोबाइल पर फेसबुक, यू-ट्यूब, सोशल साइट्स देख रहे हैं।
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इसमें व्यवधान होने पर बेचैनी, घबराहट, चिड़चिड़ापन और गुस्से की समस्याएं देखी गईं। पढ़ाई, व्यवहार और कार्य प्रभावित भी होने लगे। परिजन और मित्रों से संपर्क कम होने के साथ बाहर आवाजाही में भी कमी आई।
संयोजक डॉ. यूसी गर्ग ने बताया कि स्टडी में पाया कि युवा मोबाइल तक ही सिमट कर रह गए। इसमें इतने तल्लीन हो गए कि मानसिक और शारीरिक सेहत भी खराब होने लगी।
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अधिवेशन के दूसरे दिन डॉ. काश्यपी ने कहा कि देश के चुनिंदा शहरों में 18-30 साल की उम्र्र के छात्र और युवाओं पर स्टडी की। इसमें इंजीनियरिंग, डिग्री कॉलेज और कामकाजी युवा रहे। स्टडी में पाया कि यह 24 घंटे में छह से नौ घंटे तक मोबाइल पर फेसबुक, यू-ट्यूब, सोशल साइट्स देख रहे हैं।
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इसमें व्यवधान होने पर बेचैनी, घबराहट, चिड़चिड़ापन और गुस्से की समस्याएं देखी गईं। पढ़ाई, व्यवहार और कार्य प्रभावित भी होने लगे। परिजन और मित्रों से संपर्क कम होने के साथ बाहर आवाजाही में भी कमी आई।
संयोजक डॉ. यूसी गर्ग ने बताया कि स्टडी में पाया कि युवा मोबाइल तक ही सिमट कर रह गए। इसमें इतने तल्लीन हो गए कि मानसिक और शारीरिक सेहत भी खराब होने लगी।
ईटिंग डिसआर्डर से महिलाएं पाल रहीं तनाव: डॉ. अरुणा
कर्नाटक की डॉ. अरुणा यादिवाल ने बताया कि ईटिंग डिसआर्डर से युवतियां तनाव पाल रहीं हैं। 16-20 फीसदी युवतियां इसकी शिकार हैं, जिनकी उम्र 22 से 30 साल के बीच है।
इनमें खुद को छरहरी दिखने, कामकाजी युवतियां नौकरी की वजह से भी ईटिंग डिसआर्डर की शिकार हैं। महिलाओं में माइग्रेन के हार्मोंस भी जिम्मेदार हैं। मोटापा, मधुमेह और स्मोकिंग भी वजह हैं।
पढ़ाई में कमजोर, शरारती खूब तो है बीमारी: डॉ. सागर लवानियां
पढ़ाई में दिमाग नहीं चलता, लेकिन शरारत और धमाचौकड़ी में खूब मन रमता है। एक स्थान पर टिकता नहीं है, ऐसे बच्चे अटेंशन डेफिसिटी हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर के मरीज हो सकते हैं। डॉ. सागर लवानियां ने बताया कि ऐसे बच्चे एक स्थान पर नहीं टिकते, यहां तक कि पसंदीदा कार्टून चैनल होने पर बार-बार चैनल बदलेंगे।
कर्नाटक की डॉ. अरुणा यादिवाल ने बताया कि ईटिंग डिसआर्डर से युवतियां तनाव पाल रहीं हैं। 16-20 फीसदी युवतियां इसकी शिकार हैं, जिनकी उम्र 22 से 30 साल के बीच है।
इनमें खुद को छरहरी दिखने, कामकाजी युवतियां नौकरी की वजह से भी ईटिंग डिसआर्डर की शिकार हैं। महिलाओं में माइग्रेन के हार्मोंस भी जिम्मेदार हैं। मोटापा, मधुमेह और स्मोकिंग भी वजह हैं।
पढ़ाई में कमजोर, शरारती खूब तो है बीमारी: डॉ. सागर लवानियां
पढ़ाई में दिमाग नहीं चलता, लेकिन शरारत और धमाचौकड़ी में खूब मन रमता है। एक स्थान पर टिकता नहीं है, ऐसे बच्चे अटेंशन डेफिसिटी हाइपरएक्टिविटी डिसआर्डर के मरीज हो सकते हैं। डॉ. सागर लवानियां ने बताया कि ऐसे बच्चे एक स्थान पर नहीं टिकते, यहां तक कि पसंदीदा कार्टून चैनल होने पर बार-बार चैनल बदलेंगे।
बार-बार हाथ धोना, सामान सहेजना है मानसिक बीमारी: डॉ. नाओमी
बार-बार हाथ धोना, सामान सहेजकर रखना, यह कोई सुव्यवस्थित आदत नहीं बल्कि बीमारी है। इंग्लैंड की डॉ. नाओमी ने बताया कि यह बिस्तर, किताबें, घर के सामान को बार-बार ठीक करेंगे। दूसरों से भी इसी तरह की अपेक्षा करते हैं। कोई ऐसा न करे तो उस पर गुस्सा और चिल्लाते हैं।
कार्य का तनाव दे रहा गुस्सा: डॉ. राहुल गुप्ता
गुस्सा सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन बात-बात पर गुस्सा होना, सीधा जवाब न देना या फिर शांत रहने वाले लोग जब उत्तेजित होने लगें तो यह गुस्सा बीमारी की वजह है।
इंग्लैंड के डॉ. राहुल गुप्ता ने बताया कि गुस्सा की सबसे बड़ी वजह तनाव है। 22 से 26 फीसदी युवा इसके ज्यादा शिकार हैं। कामकाजी युवाओं में कार्य का दबाव, उनकी बातों को तरजीह न देना, उनके प्रति नकारात्मक रवैए से स्थिति ज्यादा बिगड़ती है।
बार-बार हाथ धोना, सामान सहेजकर रखना, यह कोई सुव्यवस्थित आदत नहीं बल्कि बीमारी है। इंग्लैंड की डॉ. नाओमी ने बताया कि यह बिस्तर, किताबें, घर के सामान को बार-बार ठीक करेंगे। दूसरों से भी इसी तरह की अपेक्षा करते हैं। कोई ऐसा न करे तो उस पर गुस्सा और चिल्लाते हैं।
कार्य का तनाव दे रहा गुस्सा: डॉ. राहुल गुप्ता
गुस्सा सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन बात-बात पर गुस्सा होना, सीधा जवाब न देना या फिर शांत रहने वाले लोग जब उत्तेजित होने लगें तो यह गुस्सा बीमारी की वजह है।
इंग्लैंड के डॉ. राहुल गुप्ता ने बताया कि गुस्सा की सबसे बड़ी वजह तनाव है। 22 से 26 फीसदी युवा इसके ज्यादा शिकार हैं। कामकाजी युवाओं में कार्य का दबाव, उनकी बातों को तरजीह न देना, उनके प्रति नकारात्मक रवैए से स्थिति ज्यादा बिगड़ती है।
इन बातों का रखें ख्याल
- दो-ढाई घंटे से ज्यादा मोबाइल पर समय बिताएं तो उन्हें आगाह करें।
- मोबाइल के शुरुआत में ही सीमित उपयोग के लिए प्रेरित करें।
- उनके साथ समय बिताएं, कॉलेज, कॅरियर समेत अन्य बातों पर चर्चा करें।
- मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने पर टोकने पर प्रतिकूल जवाब मिले तो चिकित्सक से परामर्श लें।
(जैसा डॉ. यूसी गर्ग ने बताया)
- दो-ढाई घंटे से ज्यादा मोबाइल पर समय बिताएं तो उन्हें आगाह करें।
- मोबाइल के शुरुआत में ही सीमित उपयोग के लिए प्रेरित करें।
- उनके साथ समय बिताएं, कॉलेज, कॅरियर समेत अन्य बातों पर चर्चा करें।
- मोबाइल पर ज्यादा समय बिताने पर टोकने पर प्रतिकूल जवाब मिले तो चिकित्सक से परामर्श लें।
(जैसा डॉ. यूसी गर्ग ने बताया)