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दुर्दशा का शिकार है मेहता पुस्तकालय, पुस्तकालय में बची है मात्र 5 पुस्तकें
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कासगंज सोरों की मेहता पाठशाला जिसकी ऊपरी मंजिल में संचालित होता था पुस्तकालय
- फोटो : KASGANJ
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सोरों(कासगंज)। तीर्थनगरी में स्थापित मेहता पुस्तकालय पिछले 24 वर्षों से बंद है। मेहता संस्कृत पाठशाला के ऊपर बने विशाल हॉल में संचालित यह पुस्तकालय 1996 तक काफी समृद्ध था। इसमें आठ अलमारियों में करीब 3000 पुस्तकें मौजूद थीं। लोगों ने फिर से व्यवस्थाएं दुरुस्त कर पुस्तकालय के विधिवत संचालन की मांग की है। मेहता संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य ही इस पुस्तकालय का संचालन करते थे।
महाविद्यालय के प्राचार्य पं. रामखिलावन शास्त्री ने 30 जून 1996 को सेवानिवृृत्त होने से पूर्व यह पुस्तकें लिखित रूप में संत तुलसीदास इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य सत्यपाल सिंह को सौंप दीं थीं। उसके बाद संस्कृत महाविद्यालय आचार्यों व छात्रों के न होने के कारण पुस्तकालय बंद हो गया।
वर्ष 2017 में यह संस्कृत महाविद्यालय तत्कालीन जिलाधिकारी के विजयेंद्र पांडियान व पालिका अध्यक्ष अर्चना यादव की पहल के बाद फिर से शुरू किया गया लेकिन पूर्ण व्यवस्थाओं के न होने से संचालित नहीं हो सका। पुस्तकों का भी अभाव है। तीर्थनगरी के श्रीकांत तिवारी, कृष्णकांत वशिष्ठ, आदित्य दुबे, अभय स्थापक, रविंद्र ब्रह्मचारी, शिव वैंदेल आदि ने व्यवस्थाएं व पुस्तकों को उपलब्ध कराकर पुस्तकालय को संचालित कराने की मांग की है।
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वर्तमान में बची हैं पांच
पुस्तकें पाठशाला में रखे रजिस्टर में पूर्व में आठ अलमारियों में रखी पुुस्तकों का ब्योरा अंकित है। जिनमें लगभग 3000 पुस्तकें थीं। इनमें चारों वेदों, मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण, हमीर रासो आदि ऐतिहासिक आध्यात्मिक व विषयगत हिंदी व संस्कृत भाषा में पुस्तकें शामिल थीं। लेकिन वर्तमान में केवल शब्द कल्पद्रम: नाम से पांच खंडों की पुस्तकें ही मौजूद हैं। - हेंमेंद्र शास्त्री, संस्कृत पाठशाला प्रधानाचार्य,
पुस्तकालय की होगी रूपरेखा तैयार
तीर्थनगरी में एक पुस्तकालय का होना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए रूपरेखा तैयार की जाएगी। ताकि शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों आदि के लिए अध्ययन की व्यवस्था हो सके। - मुन्नीदेवी, पालिकाध्यक्ष, पदेल प्रबंधक पाठशाला।
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महाविद्यालय के प्राचार्य पं. रामखिलावन शास्त्री ने 30 जून 1996 को सेवानिवृृत्त होने से पूर्व यह पुस्तकें लिखित रूप में संत तुलसीदास इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य सत्यपाल सिंह को सौंप दीं थीं। उसके बाद संस्कृत महाविद्यालय आचार्यों व छात्रों के न होने के कारण पुस्तकालय बंद हो गया।
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वर्ष 2017 में यह संस्कृत महाविद्यालय तत्कालीन जिलाधिकारी के विजयेंद्र पांडियान व पालिका अध्यक्ष अर्चना यादव की पहल के बाद फिर से शुरू किया गया लेकिन पूर्ण व्यवस्थाओं के न होने से संचालित नहीं हो सका। पुस्तकों का भी अभाव है। तीर्थनगरी के श्रीकांत तिवारी, कृष्णकांत वशिष्ठ, आदित्य दुबे, अभय स्थापक, रविंद्र ब्रह्मचारी, शिव वैंदेल आदि ने व्यवस्थाएं व पुस्तकों को उपलब्ध कराकर पुस्तकालय को संचालित कराने की मांग की है।
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वर्तमान में बची हैं पांच
पुस्तकें पाठशाला में रखे रजिस्टर में पूर्व में आठ अलमारियों में रखी पुुस्तकों का ब्योरा अंकित है। जिनमें लगभग 3000 पुस्तकें थीं। इनमें चारों वेदों, मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण, हमीर रासो आदि ऐतिहासिक आध्यात्मिक व विषयगत हिंदी व संस्कृत भाषा में पुस्तकें शामिल थीं। लेकिन वर्तमान में केवल शब्द कल्पद्रम: नाम से पांच खंडों की पुस्तकें ही मौजूद हैं। - हेंमेंद्र शास्त्री, संस्कृत पाठशाला प्रधानाचार्य,
पुस्तकालय की होगी रूपरेखा तैयार
तीर्थनगरी में एक पुस्तकालय का होना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए रूपरेखा तैयार की जाएगी। ताकि शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों आदि के लिए अध्ययन की व्यवस्था हो सके। - मुन्नीदेवी, पालिकाध्यक्ष, पदेल प्रबंधक पाठशाला।