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मथुरा: पालकी में सवार हो भगवान रंगनाथ ने दिए मोहिनी रूप में भक्तों को दर्शन
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मथुरा। वृंदावन स्थित रंगनाथ मंदिर के ब्रह्मोत्सव में मोहिनी रूप धारण कर चांदी की पालकी में बैठक?
- फोटो : VRINDAVAN
वृंदावन (मथुरा)। श्री रंगमंदिर दिव्यदेश के ब्रह्मोत्सव के पंचम दिन ठाकुर रंगनाथ मोहिनी रूप धारण कर चांदी की पालकी में सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकले। भक्तों ने ठाकुरजी की आरती उतारकर भव्य स्वागत किया।
शुक्रवार को श्री रंगमंदिर दिव्यदेश के दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव में शुक्रवार को ठाकुरजी मोहिनी रूप धारण कर चांदी की पालकी में सवार होकर भक्तों को कृतार्थ करने निकले। निज गर्भगृह से बाहर निकलकर जब पालकी बारहद्वारी में विराजमान हुई तो वैदिक परंपरानुसार कुंभ आरती उतारी गई। मृदंग, शहनाई की मधुर ध्वनि के साथ आरती के साथ रंगनाथ भगवान की जयघोष से मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठा। मंदिर परिसर से बाहर निकलकर पालकी की सवारी प्रमुख मार्गों से होती हुई रंगजी का बड़ा बगीचा पहुंची। जहां विश्राम के उपरांत श्री वैष्णवीय परंपरा से जुड़े अनेक मंदिरों में भी पालकी की सवारी दर्शनों के लिए पहुंची। यहां भक्तों ने जगह-जगह पर आरती उतारकर स्वागत किया।
मंदिर की सीईओ अनघा श्रीनिवासन ने बताया कि मान्यतानुसार समुद्र मंथन के समय भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर दानवों की मति भ्रमित कर दी थी। प्रभु के इस अलौकिक छवि के जहां भक्त मोहमाया से विरत होकर भक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होता है। सायंकालीन सत्र में ठाकुर गोदारंगमन्नार भगवान सिंह शार्दूल पर विराजमान हुए। प्रभु के इस स्वरूप के दर्शन मात्र से भक्त भयमुक्त होकर भगवान की शरणागत हो गए।
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शुक्रवार को श्री रंगमंदिर दिव्यदेश के दस दिवसीय ब्रह्मोत्सव में शुक्रवार को ठाकुरजी मोहिनी रूप धारण कर चांदी की पालकी में सवार होकर भक्तों को कृतार्थ करने निकले। निज गर्भगृह से बाहर निकलकर जब पालकी बारहद्वारी में विराजमान हुई तो वैदिक परंपरानुसार कुंभ आरती उतारी गई। मृदंग, शहनाई की मधुर ध्वनि के साथ आरती के साथ रंगनाथ भगवान की जयघोष से मंदिर परिसर गुंजायमान हो उठा। मंदिर परिसर से बाहर निकलकर पालकी की सवारी प्रमुख मार्गों से होती हुई रंगजी का बड़ा बगीचा पहुंची। जहां विश्राम के उपरांत श्री वैष्णवीय परंपरा से जुड़े अनेक मंदिरों में भी पालकी की सवारी दर्शनों के लिए पहुंची। यहां भक्तों ने जगह-जगह पर आरती उतारकर स्वागत किया।
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मंदिर की सीईओ अनघा श्रीनिवासन ने बताया कि मान्यतानुसार समुद्र मंथन के समय भगवान ने मोहिनी रूप धारण कर दानवों की मति भ्रमित कर दी थी। प्रभु के इस अलौकिक छवि के जहां भक्त मोहमाया से विरत होकर भक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होता है। सायंकालीन सत्र में ठाकुर गोदारंगमन्नार भगवान सिंह शार्दूल पर विराजमान हुए। प्रभु के इस स्वरूप के दर्शन मात्र से भक्त भयमुक्त होकर भगवान की शरणागत हो गए।
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