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मार्गशीर्ष मोक्षदा एकादशी का प्रथम स्नान पर्व आज
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कासगंज के सोरों हरिपदी घाट पर सजावट करता कर्मी
- फोटो : KASGANJ
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सोरों (कासगंज)। मार्गशीर्ष महोत्सव का पहला स्नान पर्व आज शुक्रवार को होगा। यह स्नान पर्व मार्गशीर्ष मोक्षदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। स्नान को लेकर सभी तैयारियां की जा चुकी हैं। हरिपदी के आसपास के इलाकों में तमाम खाद्य पदार्थों की दुकानें सज गई हैं। मोक्षदा एकादशी स्नान को लेकर साधु संतों और श्रद्धालुओं का डेरा पूर्व संध्या से ही शुरू हो गया है।
देश के विभिन्न अखाड़ों के साधू संत, नागा साधू मार्गशीर्ष महोत्सव को लेकर तीर्थनगरी में अपना डेरा जमा चुके हैं। जहां तहां आश्रमों में साधुओं के डेरे लगे है।
हरिपदी के परिक्रमा मार्ग पर काफी रौनक है। वातावरण गंगा भक्ति का बना हुआ है। लोग गंगा मैय्या और भगवान वराह की जय जयकार कर रहे हैं। पंडित दिलीप शास्त्री ने बताया कि मोक्षदा एकादशी महोत्सव पर ब्रह्ममुहूर्त से लेकर पूरे दिन स्नान का मुहूर्त है।
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पितरों को मिलता है मोक्ष
मोक्षदा एकादशी को लेकर धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गंगास्नान करके व्रत करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। गंगास्नान करने के बाद व्रत करने वाले श्रद्धालु के पितृ के लिए भी मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था गीता का उपदेश
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मोक्षदा एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। तीर्थनगरी के पौराणिक महत्व पर शोध करने वाले साहित्यकार डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित ने बताया कि यह वराह पुराण में वर्णित है।
भगवान विष्णु ने लिया था एकादशी पर वराह अवतार
पृथ्वी को पाताल में ले जा रहे राक्षण हिरण्याक्ष से पृथ्वी की रक्षा के लिए एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु का वराह रूप में अवतरण हुआ और राक्षस हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को पाताल से उदृढ़ कराया।
राक्षस का वध करने के पश्चात भगवान वराह ने पृथ्वी माता को उपदेश में कहा कि हे देवी कि किसी सामान्य स्थान पर गंगा स्नान करने की अपेक्षा काशी में दस गुना, प्रयाग में सौ गुना, गंगा सागर में हजार गुना तथा सूकरक्षेत्र में अनंत गुना फल प्राप्त होता है। अन्य तीर्थों में 60 हजार वर्ष तप करके पर जो फल प्राप्त होता है वह तप सूकर क्षेत्र में आधा प्रहर करने के उपरांत ही फल प्राप्त हो जाता है।
वराह कुंड है हरिपदी गंगा
भगवान वराह ने मार्गशीर्ष मास की एकादशी को अवतार लिया। वहीं द्वादशी को उन्होंने शरीर का त्याग कर दिया। धार्मिक मान्यता है कि तीर्थनगरी में हरिपदी के कुंड को स्वयं भगवान वराह ने अपने खुरों से स्वयं अपने शरीर का त्याग करने के लिए बनाया था। इस कुंड को वराह कुंड भी कहते हैं। इसी कुंड में उन्होंने अपना शरीर त्यागा था। इस कुंड में जो भी अपने दिवंगतों की अस्थियां विसर्जित करते हैं वह 72 घंटे में जल रूप में परिवर्तित हो जाती हैं।
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देश के विभिन्न अखाड़ों के साधू संत, नागा साधू मार्गशीर्ष महोत्सव को लेकर तीर्थनगरी में अपना डेरा जमा चुके हैं। जहां तहां आश्रमों में साधुओं के डेरे लगे है।
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हरिपदी के परिक्रमा मार्ग पर काफी रौनक है। वातावरण गंगा भक्ति का बना हुआ है। लोग गंगा मैय्या और भगवान वराह की जय जयकार कर रहे हैं। पंडित दिलीप शास्त्री ने बताया कि मोक्षदा एकादशी महोत्सव पर ब्रह्ममुहूर्त से लेकर पूरे दिन स्नान का मुहूर्त है।
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पितरों को मिलता है मोक्ष
मोक्षदा एकादशी को लेकर धार्मिक मान्यता है कि इस दिन गंगास्नान करके व्रत करने से पितरों को मोक्ष मिलता है। गंगास्नान करने के बाद व्रत करने वाले श्रद्धालु के पितृ के लिए भी मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था गीता का उपदेश
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मोक्षदा एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। तीर्थनगरी के पौराणिक महत्व पर शोध करने वाले साहित्यकार डॉ. राधाकृष्ण दीक्षित ने बताया कि यह वराह पुराण में वर्णित है।
भगवान विष्णु ने लिया था एकादशी पर वराह अवतार
पृथ्वी को पाताल में ले जा रहे राक्षण हिरण्याक्ष से पृथ्वी की रक्षा के लिए एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु का वराह रूप में अवतरण हुआ और राक्षस हिरण्याक्ष का वध करके पृथ्वी को पाताल से उदृढ़ कराया।
राक्षस का वध करने के पश्चात भगवान वराह ने पृथ्वी माता को उपदेश में कहा कि हे देवी कि किसी सामान्य स्थान पर गंगा स्नान करने की अपेक्षा काशी में दस गुना, प्रयाग में सौ गुना, गंगा सागर में हजार गुना तथा सूकरक्षेत्र में अनंत गुना फल प्राप्त होता है। अन्य तीर्थों में 60 हजार वर्ष तप करके पर जो फल प्राप्त होता है वह तप सूकर क्षेत्र में आधा प्रहर करने के उपरांत ही फल प्राप्त हो जाता है।
वराह कुंड है हरिपदी गंगा
भगवान वराह ने मार्गशीर्ष मास की एकादशी को अवतार लिया। वहीं द्वादशी को उन्होंने शरीर का त्याग कर दिया। धार्मिक मान्यता है कि तीर्थनगरी में हरिपदी के कुंड को स्वयं भगवान वराह ने अपने खुरों से स्वयं अपने शरीर का त्याग करने के लिए बनाया था। इस कुंड को वराह कुंड भी कहते हैं। इसी कुंड में उन्होंने अपना शरीर त्यागा था। इस कुंड में जो भी अपने दिवंगतों की अस्थियां विसर्जित करते हैं वह 72 घंटे में जल रूप में परिवर्तित हो जाती हैं।