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लॉकडाउन: परिवार पालना हुआ मुश्किल, कर्जे पर चल रही कुम्हारों की 'जिंदगी'
Thu, 30 Apr 2020 12:07 AM IST
Abhishek Saxena
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: Abhishek Saxena
Updated Thu, 30 Apr 2020 12:07 AM IST
सार
शहर में 75 कुम्हार।
500 से ज्यादा लोग जुड़े काम से
सीजन में 10 लाख रुपये का कारोबार।
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कुम्हारों द्वारा बनाए मिट्टी के मटके
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दोपहर करीब 12 बजे रहे थे। सिर पर सूरज चढ़ा हुआ था। रुई की मंडी मार्ग के किनारे मटके रखकर बैठी वृद्धा शांति देवी ग्राहकों का इंतजार कर रही थी। घंटों बीतने के बाद भी उसकी मिट्टी का मोल लगाने वाले कोई नहीं आया।
लॉकडाउन में अमर उजाला ने मंगलवार को विभिन्न क्षेत्रों में जाकर कुम्हारों की स्थिति देखी। चटक गर्मी के बावजूद उनके द्वारा मेहनत से बनाए गए सामान को खरीदने वाला कोई नहीं था। इधर, पुलिस की सख्ती अलग से परेशान कर रही थी।
कुम्हारों ने बताया इस संकट को एक माह से ज्यादा बीत चुका है। लगातार आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है। बड़ा परिवार है। 10 रुपये सैकड़े पर कर्ज लेकर गुजारा करना पड़ रहा है। पीढ़ियों ने ऐसा संकट नहीं देखा। जबकि इस सीजन में फुरसत नहीं मिलती थी।
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लॉकडाउन में अमर उजाला ने मंगलवार को विभिन्न क्षेत्रों में जाकर कुम्हारों की स्थिति देखी। चटक गर्मी के बावजूद उनके द्वारा मेहनत से बनाए गए सामान को खरीदने वाला कोई नहीं था। इधर, पुलिस की सख्ती अलग से परेशान कर रही थी।
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कुम्हारों ने बताया इस संकट को एक माह से ज्यादा बीत चुका है। लगातार आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही है। बड़ा परिवार है। 10 रुपये सैकड़े पर कर्ज लेकर गुजारा करना पड़ रहा है। पीढ़ियों ने ऐसा संकट नहीं देखा। जबकि इस सीजन में फुरसत नहीं मिलती थी।
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इस समय रोटी जुटाना मुश्किल
50 वर्ष से ज्यादा समय हो गया। मगर, ऐसा संकट पहली बार आया है। रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है। - शांति देवी।
रुई की मंडी मेरा मिट्टी के तंदूर बेचने का मुख्य काम है। सहालग में अच्छी मांग रहती। मगर, इस समय सब खत्म हो चुका है। - हुकुम सिंह, पुलिस लाइन।
काम बिल्कुल नहीं है। दूसरों की मेहरबानी के चलते राशन की जुगाड़ हो पा रही है। - छन्नोलाल, टीला गोकुलपुरा।
गरीब आदमी का मरना तय है। काम बिल्कुल खत्म हो गया था, इसलिए परिवार पालने के लिए सब्जी की ठेल लगा ली। - केशव, शाहगंज।
50 वर्ष से ज्यादा समय हो गया। मगर, ऐसा संकट पहली बार आया है। रोटी जुटाना मुश्किल हो गया है। - शांति देवी।
रुई की मंडी मेरा मिट्टी के तंदूर बेचने का मुख्य काम है। सहालग में अच्छी मांग रहती। मगर, इस समय सब खत्म हो चुका है। - हुकुम सिंह, पुलिस लाइन।
काम बिल्कुल नहीं है। दूसरों की मेहरबानी के चलते राशन की जुगाड़ हो पा रही है। - छन्नोलाल, टीला गोकुलपुरा।
गरीब आदमी का मरना तय है। काम बिल्कुल खत्म हो गया था, इसलिए परिवार पालने के लिए सब्जी की ठेल लगा ली। - केशव, शाहगंज।