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परिवार दिवसः विशेषज्ञों से जानिए परिवार का महत्व, मरीजों पर हुए शोध से ये बात आई सामने

Wed, 15 May 2019 02:05 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Wed, 15 May 2019 02:05 PM IST
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International Day of Families spacial story on family study
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ.दिनेश शर्मा व समाजसेवी - फोटो : अमर उजाला
बदलते परिवेश की मजबूरियों के चलते एकल परिवार का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है। संयुक्त परिवार अब अधिक देखने के लिए नहीं मिल रहे। मानसिक रोग विशेषज्ञ मानते हैं कि संयुक्त परिवार में रहने वाले लोगों में नैतिक और सामाजिक मूल्य ज्यादा रहते हैं। एकल परिवार में पले-बढ़े बच्चों में मानसिक विकृतियां होने का खतरा अधिक रहता है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पश्चिमी देश और भारत के मरीजों पर स्टडी की। अपने देश में इसका सेंटर मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय रहा। विशेषज्ञों की स्टडी में यह बात सामने आई कि मानसिक रोगियों के ठीक होने की प्रतिशतता भारतीय मरीजों में ज्यादा रही। इसकी वजह संयुक्त परिवार हैं। 
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यहां तक कि मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में मरीज के इलाज के लिए परिवार वार्ड भी है, जहां मरीज का परिजन साथ रहता है। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में एकल परिवार का चलन लगातार बढ़ रहा है। इसकी बड़ी वजह पति-पत्नी की नौकरी और उच्च शिक्षा के बाद देश-विदेश में नौकरी भी रही।
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इस माहौल में चाचा-चाची, ताऊ-ताई समेत अन्य रिश्तेदारों को साथ रखना इतना आसान नहीं रहा। चाचा-चाची, ताऊ-ताई, भाई-भाभी, बुआ परिवार से कम हुए तो अब मां-बाप भी परिवार में बड़ी मुश्किल से जगह बना पा रहे हैं।  

डॉ. रणवीर सिंह, अध्यक्ष समाज कार्य विभाग, समाज विज्ञान संस्थान डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय का कहना है कि संयुक्त परिवार में सामाजिक और मानवीय मूल्य ज्यादा रहते हैं, जिससे एक-दूसरे के प्रति अपनत्व और प्रेम की भावना विकसित होती है। अब लोगों को बाहर नौकरी के लिए जाना पड़ता है। महिलाएं भी नौकरी कर रही हैं। पहले ऐसा नहीं होता था, नई पीढ़ी के सामने मजबूरी भी है। 

डॉ. दिनेश राठौर, वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ, मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय का कहना है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने स्टडी ने भी माना कि मानसिक रोगियों की ठीक होने की प्रतिशतता भारतीय मरीजों में पश्चिमी देशों के मुकाबले ज्यादा रही।
 

संयुक्त परिवार में बड़े-बुजुर्ग बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाते हैं। एकल परिवार में पति-पत्नी जॉब पर जाने के बाद बच्चे सोशल मीडिया, टीवी पर समय बिताते हैं। मनोरंजन के लिए तैयार कार्यक्रम को हकीकत मानकर उसी तरह व्यवहार करते हैं। 

समाजसेवी रवि कुमार बंसल का मानना है कि भरे-पूरे परिवार में रहे और अब एकल परिवार का चलन है। इसमें नई पीढ़ी को भी दोष नहीं दे सकते। व्यवसाय और नौकरी की मजबूरी के चलते एकल परिवार होने लगे। बड़े-बुजुर्ग भी अब यह समझने लगे हैं। नई पीढ़ी भले ही दूर रहें, लेकिन बुजुर्गों की सेवा और सम्मान में कमी नहीं आने देनी चाहिए। 
 
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