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ब्रज की होली का मुकुटमणि है दाऊजी का हुरंगा, नंगे बदन पड़े प्रेम से पगे कोड़े

Wed, 11 Mar 2020 01:02 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा Published by: Abhishek Saxena Updated Wed, 11 Mar 2020 01:02 PM IST
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Holi 2020: Huranga In Dauji Maharaj Mandir Baldev
दाऊजी का हुरंगा - फोटो : अमर उजाला
बरसाना, नंदगांव, मथुरा एवं गोकुल की होली के बाद दाऊजी में हुरंगा हुआ। नंगे बदन पर कोड़ों की मार देखने के लिए यहां हजारों देशी-विदेशी श्रद्धालु उमड़े। हुरंगा के नायक शेषावतार दाऊजी महाराज हैं। 
Holi 2020: Huranga In Dauji Maharaj Mandir Baldev
दाऊजी मंदिर में धूमधाम से मनाया गया हुरंगा - फोटो : अमर उजाला
दाऊजी के हुरंगा की अनूठी परंपरा है। कहावत है कि ‘देखि-देखि या ब्रज की होरी, ब्रह्मा मन ललचाबै।’ ब्रज की होली भगवान श्रीकृष्ण पर केंद्रित है, वहीं, दाऊजी का हुरंगा उनके बड़े भाई बलदेव जी पर केंद्रित है। हुरंगा में पुरुष गोप समूह को महिलाएं गोपिका स्वरूप द्वारा प्रेम से भीगे पोतने (कोड़ों) की मार नंगे बदन पर खाते हैं।

 
Holi 2020: Huranga In Dauji Maharaj Mandir Baldev
दाऊजी का हुरंगा - फोटो : अमर उजाला
दाऊजी का हुरंगा ब्रज की होली मुकुटमणि है। हुरंगा सुबह 12 बजे से शुरू हुआ। बता दें कि हुरंगा खेलने के लिए ब्रज की गोपिकाएं आकर्षक पहनावे में परंपरागत लहंगा-फरिया व आभूषण पहन कर झुंड में मंदिर के विभिन्न द्वारों से होली गीत गाते हुए प्रवेश करतीं हैं। मंच पर श्रीकृष्ण, बलराम सखाओं के साथ अबीर गुलाल उड़ाते हैं।
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दाऊजी का हुरंगा - फोटो : अमर उजाला
दाऊजी में गोस्वामी कल्याणदेव के वंशज पांडेय समाज के लोग ही हुरंगा खेलते हैं। छत, छज्जों से क्विंटलों गुलाल एवं फूलों की पंखुड़ियां उड़ाईं गईं। इस दौरान आकाश इंद्र धनुषी होता है। हुरंगा में हुरियारिनें झंडा छीनने का प्रयास करती हैं। पुरुष इसे बचाने का प्रयास करते हैं। अंत में महिलाएं झंडा छीनने में सफल होकर हारे रे रसिया, जीत चली ब्रज नारि, इसके साथ हुरंगा संपन्न हो जाता है।
 
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हुरंगा खेलते लोग - फोटो : अमर उजाला
मंदिर रिसीवर आरके पांडेय ने बताया कि हुरंगा में आठ क्विंटल, टेसू फूल, ढाई क्विंटल केसरिया रंग, 11 क्विंटल अबीर गुलाल, 11 क्विंटल गुलाल एवं विभिन्न प्रकार के फूलों का प्रयोग हुआ। टेसू के फूलों के रंग में केसर, चूना, फिटकरी मिला कर इसे प्राकृतिक रूप से तैयार किया गया था। गुलाल को मशीनों द्वारा उड़ाया जाता है। वहीं रंगों के लिए फव्वारे लगाए गए। हुरंगा में साधु-संतों का महाकुम्भ देखने को मिला।
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