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हाथरस भगदड़: दलितों के गढ़ में बाबा को मसीहा मानते हैं अनुयायी, मरने वालों और घायलों में अधिकांश दलित व पिछड़े

Fri, 05 Jul 2024 03:22 PM IST
आकाश दुबे माई सिटी रिपोर्टर, आगरा
माई सिटी रिपोर्टर, आगरा Published by: आकाश दुबे Updated Fri, 05 Jul 2024 03:22 PM IST
सार

भगदड़ में 121 लोगों की जान गई, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। कई लोग घायल हो गए। घटना के बाद लोगों में दर्द है तो आयोजकों की लापरवाही पर गुस्सा भी। जिस आयोजन के लिए 80 हजार लोगों की अनुमति ली गई थी।

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Hathras stampede Followers consider Baba as Messiah in Dalit stronghold
Baba Narayan Sakar hari - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हाथरस में हुए सत्संग में 2.50 लाख से अधिक अनुयायी यूं ही नहीं पहुंचे थे। दलितों का गढ़ माने जाने वाले आगरा मंडल में भोले बाबा का एकछत्र राज चलता है। कस्बे और गांव से लेकर गली- मोहल्लों में बाबा के सेवादार हैं। वंचित समाज में बाबा की गहरी पैठ है। इनमें दलितों के साथ अति दलित और पिछड़े भी शामिल हैं। बाबा के भक्तों में नेताओं के साथ अफसर भी शामिल हैं।

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भोले बाबा का सत्संग 2 जुलाई को हाथरस के सिकंदराराऊ में आयोजित हुआ था। इसमें आगरा, एटा, मथुरा, फिरोजाबाद, कासगंज, फरीदाबाद, बुलंदशहर, ललितपुर सहित 15 से अधिक जिलों के साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा से अनुयायी पहुंचे थे। इनमें भी महिलाओं की संख्या ज्यादा थी।

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भगदड़ में 121 लोगों की जान गई, जिनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। कई लोग घायल हो गए। घटना के बाद लोगों में दर्द है तो आयोजकों की लापरवाही पर गुस्सा भी। जिस आयोजन के लिए 80 हजार लोगों की अनुमति ली गई, वहां पर 2.50 लाख से अधिक लोग आ गए थे। मगर, खुलकर कोई कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है। लोगों का कहना है कि बाबा के सत्संग से अमृत मिलता है।

एससी-ओबीसी की ज्यादा मौतें
पूरे मंडल में अनुसूचित जाति की आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है। हाथरस भगदड़ में आगरा मंडल की बात करें तो सबसे ज्यादा मौतें अन्य जिलों से आगरा की 16 महिलाओं और 1 युवती की हुई। इनमें सभी एससी और ओबीसी वर्ग की हैं।

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सूरजपाल आगरा में बने भोले बाबा
सूरजपाल भले ही मूलरूप से बहादुर नगर, पटियाली, एटा के रहने वाले थे, लेकिन उन्होंने अपना कथित आध्यात्मिक सफर आगरा से ही शुरू किया था। 1990 के दशक में वह एसपीआर कार्यालय, आग्रा में सिपाही थे। उनके साथ काम करने वाले पूर्व कर्मचारी ने बताया कि सूरजपाल अलग-अलग सत्संग में जाने लगे। एक दिन अपने वालंटियर बना लिए। इसके वाद सत्संग शुरू कर दिया। छोटे से बड़े पंडाल बनने लगे। गली-मोहल्ले के बाद गांव-गांव में अनुयायी बन गए। इनमें दलित वर्ग के लोगों की संख्या अधिक होती थी। कोई बीमारी से ठीक होने के लिए प्रार्थना करता तो कोई काम धंधे चलाने के लिए गुहार लगाता था। अनुयायी बढ़े तो सूरजपाल ने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया। देखते ही देखते बाबा ने वंचितों के मसीहा के रूप में अपना स्थान बना लिया।

यह है जिलेवार स्थिति

  • मथुरा की 11 महिलाओं की मौत हुई है। इनमें सभी एससी-ओबीसी वर्ग की हैं। 9 महिलाएं मजदूर परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जबकि दो अच्छे परिवार से हैं। एक के पति रेलवे तो बेटा शिक्षक है। यहां की दलित आबादी 3.25 लाख के आसपास है।
  • भगदड़ में मरने वालों में एटा के 9 लोग थे। इनमें से 8 महिलाएं और 3 साल का 1 बच्चा शामिल हैं। वह अपनी मां के साथ गया था। मरने वाली महिलाएं दलित वर्ग से हैं। इनमें कोई खेतों में काम करता है तो कोई फैक्टरी में मजदूरी करने वाले हैं। यहां पर दलित आबादी 2 लाख के आसपास है। एटा-कासगंज को मिलाकर एक ही लोकसभा सीट है।

  • कासगंज की 8 महिलाओं, 20 वर्षीय युवती और 5 साल के बच्चे की मौत हुई। इनमें 8 महिलाएं एससी, जबकि दो बघेल और ठाकुर हैं। जिले में दलित आबादी की बात करें तो 1.90 लाख है। यह आंकड़ा काफी है।
  • फिरोजाबाद की एक महिला की मौत हुई। यहां पर दलित आबादी 2.25 लाख के आसपास है। लोकसभा भी एक है। इस बार के चुनाव में सपा प्रत्याशी ने जीत दर्ज की थी।

धर्म और अंधविश्वास अलग
डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय के समाज विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर अरशद बताते हैं कि भारतीय समाज में जाति और वर्ग एक दूसरे के साथ चलते हैं। धर्म भले ही कोई भी हो, वह लोगों को अच्छा बनने का रास्ता दिखाते हैं। धर्म और अंधविश्वास को अलग करके देखना चाहिए। इसको समझने की जरूरत है। अंधविश्वास को धर्म नहीं कहा जा सकता है। किसी भी बाबा की अच्छी बातों को सुनना चाहिए।

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