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Agra: बदला अंदाज... विलासिता से घरेलू उपयोग तक पहुंची हस्तकला, महज सजावटी नहीं रह गई मुगलकाल की कला

Tue, 18 Apr 2023 01:34 PM IST
भूपेन्द्र सिंह धर्मेंद्र यादव, आगरा
धर्मेंद्र यादव, आगरा Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Tue, 18 Apr 2023 01:34 PM IST
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Handicrafts from Mughal period of Agra have moved from decoration to household use
ताजनगरी की मशहूर पच्चीकारी - फोटो : अमर उजाला

उत्तर प्रदेश के आगरा में मुगलकाल में ताजमहल की पच्चीकारी से शुरू हुई आगरा की हस्तकला का अंदाज वक्त के साल बदल चुका है। ताजमहल के मॉडल तक सिमटी कारीगरी अब लकड़ी और धातुओं के प्रयोग के साथ यूटिलिटी आइटम और घरेलू उत्पाद के रूप में बदल चुकी है। यूरोप में इसकी खासी डिमांड है। दुनिया के 32 देशों में इनका निर्यात किया जाता है। हाथों के हुनर की नजाकत के कद्रदान अब भी मंदिरों में की जाने वाली कार्बिंग और ताज की पच्नीकारी को तलाश करते हैं।

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फर्नीचर से लेकर होम डेकोर तक

स्टोनमैन क्राफ्ट्स के निदेशक रजत अस्थाना बताते हैं कि मार्बल हस्तकला में यूटिलिटी और होम डेकोर उत्पादों का निर्माण की शुरुआत की गई। ताज के मॉडल, टेबल टॉप जैसे परंपरागत आइटम से निकलकर हमने मार्बल हस्तशिल्प को दैनिक जरूरत से जोड़ा। अब लकड़ी और मेटल के साथ मार्बल का इस्तेमाल करके हम होम डेकोर सहित कई उत्पाद बना रहे हैं, जिसे लोग पसंद कर रहे हैं। 

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इस प्रयोग ने मार्बल इंडस्ट्री को एक नई दिशा दी है। गौरारा, सेलम की जगह इटली का पत्थर छाया- पहले राजस्थान से सेलम पत्थर बहुतायत में आगरा आता था, लेकिन अब सेलम पत्थर बहुत कम ही आता है। इसकी जगह इटली से आने वाले एलाबास्टर पत्थर ने ली है।

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Handicrafts from Mughal period of Agra have moved from decoration to household use
दीवारों को सजाने के लिए की गई पच्चीकारी - फोटो : अमर उजाला

प्रतापपुरा पर खुला था आगरा का पहला मार्बल शोरूम

नेशनल चैंबर के पूर्व अध्यक्ष एवं पर्यटन उद्यमी राजीव तिवारी बताते हैं कि आगरा में मार्बल हैंडीक्राफ्ट मुगलकाल से चला आ रहा है। पहले चुनिंदा कारीगर जुड़े हुए थे। हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए आगरा में पहला मार्बल शोरूम इंडियन मार्बल फूलचंद बंसल ने 1962 में शुरू किया था। 

यहां कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए उनकी कलाकृतियों के वाजिब दाम दिए जाते थे। शुरुआती दिनों में यहां विदेशी सैलानी ही आते थे। इसके बाद ओसवाल सहित अन्य कारोबारियों ने एंपोरियम खोले, जिससे विदेशों में आगरा के हस्तकला को पहचाने जाने लगा। इसके बाद ही हस्तशिल्प को बड़ा बूम मिला।

90 के दशक में आई भारी गिरावट

वैश्विक आर्थिक मंदी और देश में पैदा हुए हालात के बाद 90 के दशक में एक बार फिर से मार्बल इंडस्ट्री पर संकट आया। बाजार में गिरावटआई। मार्बल के उत्पादों की डिमांड कम हो गई। इसके बाद सिलसिला चलता रहा। कोरोना काल में वर्ष 2019-20 का दौर भी मार्बल इंडस्ट्री के बुरे दौर में गिना जाता है।

तंग गलियों से फैक्टरी तक का सफर

सैकड़ों साल से गोकुलपुरा और ताजगंज की तंग गलियों में पच्चीकारी और मार्बल उत्पाद बनाने वाले कारीगर काम करते थे। अब मार्बल उत्पाद बनाने के कारखाने औद्योगिक एरिया शास्त्रीपुरम में शिफ्ट हो चुके हैं।

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