इसलिए गिरी आगरा की रैंकिंग: 18 करोड़ खर्च, फिर भी न सेंसर काम कर रहे न जीपीएस, सड़कों पर कूड़ा
आगरा में कचरा उठाने की निगरानी के लिए लगाए गए आरएफआईडी (रेडियो फ्रीक्वेंसी आईडेंटीफिकेशन डिवाइस) टैग, सेंसर और जीपीएस कबाड़ में बदल गए हैं, लेकिन सफाई व्यवस्था में सुधार नहीं हो पाया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
आगरा के 3.20 लाख घरों, दुकानों की दीवार पर आरएफआईडी टैग लगाया। सड़क पर रखे डस्टबिन में सेंसर लगाए, कूड़ा उठाने वाली गाड़ियों में जीपीएस लगाया। 18 करोड़ रुपये खर्च किए, लेकिन शहर में कूड़ा वहीं का वहीं है। चार से पांच दिन तक सड़कों पर सड़ रहे कचरे के कारण लोग नाक बंद करके सड़कों से निकलने के लिए मजबूर हैं।
स्मार्ट सिटी की ओर से कचरा उठाने की निगरानी के लिए लगाए गए आरएफआईडी (रेडियो फ्रीक्वेंसी आईडेंटीफिकेशन डिवाइस) टैग, सेंसर और जीपीएस कबाड़ में बदल गए हैं लेकिन कचरा व्यवस्था में सुधार नहीं हो पाया। हर दिन कूड़ा उठाने की जगह चार से पांच दिन बाद कूड़ा उठाया जा रहा है जबकि सेंसर और जीपीएस की व्यवस्था से कूड़े के उठान की स्मार्ट मॉनीटरिंग की जानी थी। इसी ढिलाई ने शहर की स्वच्छ सर्वेक्षण में रैंकिंग गिरा दी।
डस्टबिन से नहीं आता अलर्ट कि पूरा भर गया
आगरा स्मार्ट सिटी ने शहर के 430 डस्टबिन में बिन वाल्यूम सेंसर लगाए थे ताकि 80 फीसदी से ज्यादा कचरा होने पर यह सेंसर नगर निगम में इंटीग्रेटेड कंट्रोल एंड कमांड सेंटर पर अलर्ट भेजते कि कचरा भर गया है। डस्टबिन को उठा लिया जाए। इसी तरह इन डस्टबिन और कॉम्पेक्टर ले जाने वाली गाड़ियों के कुबेरपुर लैंडफिल साइट के रास्ते में जीपीएस से मॉनीटरिंग की जानी थी। 92 वाहनों पर जीपीएस लगाया गया। न डस्टबिन के सेंसर न जीपीएस कारगर रहे।
केवल तीन वार्डों में टैग की स्कैनिंग
नगर निगम ने ताजमहल के पास दो किमी में सफाई की जिम्मेदारी निजी कंपनी लॉयन सर्विसेज को दी है। कंपनी अक्तूबर में ताजगंज के तीन वार्डों के कुछ घरों में आरएफआईडी टैग की स्कैनिंग शुरू कर सकी है जबकि कंपनी को यह काम अप्रैल से ही शुरू करना था। शहर में 3.20 लाख घरों में से महज चार हजार घरों तक ही स्कैनिंग की जा रही है। शहर में सौ वार्ड हैं।
चार-पांच दिन बाद आते हैं कचरा उठाने
मारुति एस्टेट निवासी सुनील मानवानी ने बताया कि दो साल पहले आरएफआईडी टैग लगा गए थे। अब वह भी टूट गए हैं। कूड़ा डस्टबिन के अंदर जितना है, उससे ज्यादा बाहर बिखरा रहता है। चार से पांच दिन बाद डस्टबिन लेने आते हैं। सड़क पर पूरे सप्ताह कचरा बिखरा रहता है।
दो साल से कोई नहीं आया टैग स्कैन करने
महर्षिपुरम निवासी पवन कुमार ने कहा कि एक महीने तक टैग स्कैन करने के लिए कर्मचारी आए। पिछले दो साल से कोई नहीं आ रहा। टैग चटक कर आधा टूट गया। घर के पास डस्टबिन रखा है। यह पूरा भरने के बाद जब दुर्गंध देने लगता है तब दो दिन बाद उठाने के लिए आते हैं।
स्मार्ट सिटी के पीएमसी लीडर आनंद मेनन ने कहा कि सफाई की निगरानी के तहत आरएफआईडी टैग की स्कैनिंग अभी तीन वार्डों में ही हो रही है। हमने वाहनों में जीपीएस और डस्टबिन में सेंसर लगाकर नगर निगम को सौंप दिए।
दिसंबर में 10 और वार्डों में स्कैनिंग शुरू होगी
नगर आयुक्त निखिल टी. फुंडे ने कहा कि रेडियो फ्रीक्वेंसी टैग व्यवस्था में कई खामियां थी। इस वजह से यह शुरू नहीं हो पाया। ताजगंज में हम इसे शुरू कर चुके हैं। दिसंबर में नई कंपनी के आने पर 10 और वार्डों में स्कैनिंग शुरू करा देंगे। वाल्यूम सेंसर डोर टू डोर व्यवस्था शुरू होने पर कारगर होगी जबकि जीपीएस के लिए साफ्टवेयर बनवाया है। उसे कुछ दिनों में एक्टीवेट कर देंगे।