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UP: आजादी के ठीक बाद महज 115 रुपये प्रति तोला थी सोने की कीमत, अब भाव छू रहे आसमान; यूं होता गया महंगा

Sat, 18 Apr 2026 10:35 AM IST
Dhirendra Singh अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Sat, 18 Apr 2026 10:35 AM IST
सार

1948 में 115 रुपये प्रति तोला बिकने वाला सोना आज लाखों की संपत्ति बन चुका है और निवेश का सबसे भरोसेमंद विकल्प माना जा रहा है। दादी के संदूक के गहनों से लेकर डिजिटल गोल्ड और ETF तक, सोने का सफर विरासत से आधुनिक निवेश तक पहुंच चुका है।

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Gold’s Golden Journey: From Grandmother’s Jewelry Box to Digital Gold Investment
सोना - फोटो : प्रतिष्ठान

विस्तार

कल्पना कीजिए, आपकी दादी ने दशकों पहले अपनी शादी में जो सोने के कंगन पहने थे, उनकी कीमत तब चंद रुपयों में रही होगी। आज वही कंगन न केवल एक अनमोल विरासत हैं, बल्कि एक ऐसी संपत्ति बन चुके हैं जिसकी कीमत सैकड़ों से लाखों तक का सफर तय कर चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में सोने के भाव में आए तूफानी उछाल ने इसे निवेश का सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद किंग बना दिया है।
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1948 से 2026: एक अविश्वसनीय छलांग
आजादी के ठीक बाद, साल 1948-49 में सोने की कीमत महज ₹115 प्रति तोला (करीब 11 ग्राम) के आसपास थी। 1948 में जहां एक तोले सोने में पूरे घर का राशन आ जाता था, आज वहीं एक तोला सोना एक लग्जरी वेकेशन या भविष्य की बड़ी बचत का आधार है। पिछले 78 वर्षों में सोने के भाव में लगभग 1,50,000% (1500 गुना) की अविश्वसनीय वृद्धि हुई है। शेयर बाजार और रियल एस्टेट के उतार-चढ़ाव के बीच, सोने ने खुद को एवरग्रीन साबित किया है। और यह लोगों के बीच सुरक्षित निवेश का सबसे भरोसेमंद साथी बनकर उभरा है। अब लोग अक्षय तृतीया और दिवाली जैसे शुभ अवसरों के अलावा हर मौके पर सोना खरीद रहे हैं। इसके अलावा डिजिटल गोल्ड और गोल्ड ईटीएफ में भी निवेश कर रहे हैं

 
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पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत हैं गहने
भारतीय संस्कृति में सोना केवल एक धातु नहीं, बल्कि नारी शक्ति के अटूट विश्वास का प्रतीक है। इसे स्त्रीधन कहा जाता है, जो बुरे वक्त में एक सच्चे साथी की तरह काम करता है। मंदी हो या कोई पारिवारिक संकट, महिलाओं के पास रखे सोने के गहने हमेशा एक अभेद्य सुरक्षा कवच साबित हुए हैं। यही कारण है कि बढ़ती महंगाई और आसमान छूती कीमतों के बाद भी सोने के प्रति लोगों का लगाव कम होने के बजाए बढ़ता जा रहा है। माँ से बेटी और सास से बहू को मिलने वाले आभूषण सिर्फ संपत्ति का हस्तांतरण नहीं, बल्कि पीढ़ियों के आशीर्वाद और जुड़ाव की एक सुनहरी कड़ी हैं।

 
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नौलखा हार से लाइटवेट फैशन तक का बदलाव
आभूषण ज्वेलर्स के संचालक आनंद प्रकाश का कहना है कि वक्त बदला, फैशन बदला और सोने को पहनने का अंदाज भी बदल गया। आजादी के बाद का दौर रानी हार, हंसली और गिन्नी जैसे वजनदार गहनों का था। उस समय सोना सस्ता था और भारी गहने स्टेटस सिंबल हुआ करते थे। 2010 के बाद जब कीमतों ने रफ्तार पकड़ी, तो लाइट वेट एलीगेंट ज्वैलरी का चलन बढ़ा। वर्तमान में हल्के और भारी दोनों तरह के गहने पसंद किए और खरीदे जा रहे हैं।

खरीदारी का आधुनिक अवतार: अब अनुभव है खास
तनिष्क शोरूम के संचालक अनुराग बंसल ने बताया कि अब सोने की खरीद सिर्फ सुनार की दुकान तक सीमित नहीं है। यह एक प्रीमियम एक्सपीरियंस बन चुका है। तनिष्क ने रिवाह और ह्यूज कलेक्शन विभिन्न वर्गों की पसंद के अनुसार खासतौर पर लांच किया गया है। इसमें सोने के साथ विभिन्न रत्नों के कॉंबिनेशन से तैयार आकर्षक गहने खूब पसंद किए जा रहे हैं। उनके यहां खासतौर पर भावी दुल्हनें गहनों का लुक कपड़ों के साथ मैच कर खरीद सकती हैं।
 
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