गांधी जयंती 2021: कान्हा की नगरी सजोए है बापू की स्मृतियां, कई बार हुआ ब्रजभूमि पर आगमन
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर धर्म नगरी मथुरा में सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों पर कार्यक्रम आयोजित हुए। शहर के लोगों ने गांधी और शास्त्री को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
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मथुरा में गांधी से जुड़ी स्वतंत्रता आंदोलन की कई स्मृतियां हैं, जिनका उल्लेख विभिन्न पुस्तकों में यहां तक गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में भी किया है। 1919 में आतंकवादी अपराध अधिनियम (काला कानून) के खिलाफ गांधी के आह्वान पर देश भर में हड़ताल हुई। इस दौरान गांधी मुंबई से दिल्ली और अमृतसर की रेल यात्रा पर निकले।
इसी दौरान उन्हें मथुरा से आगे पलवल स्टेशन पर अंग्रेज सरकार की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। वहां से फिर उन्हें रेलगाड़ी से मथुरा लाया गया। रात होने पर मथुरा में गांधीजी को पुलिस बैरक में रखा गया। अगले दिन सुबह अंग्रेज उन्हें मालगाड़ी में बिठाकर महात्मा गांधी को राजस्थान की ओर ले गए।
शहर के बीच आंदोलनकारियों को किया था संबोधित
नवंबर 1921 में महात्मा गांधी ने पुराने शहर मथुरा के बीच पार्क में आंदोलनकारियों के आमरण अनशन को संबोधित किया था। अब इस स्थान को गांधी पार्क के नाम से पहचाना जाता है।
राजा महेंद्र प्रताप के देश प्रेम के थे कायल
1929 में गांधी का फिर मथुरा आगमन हुआ, तब वे रंगेश्वर स्थिति पुराने डाकघर में ठहरे थे, उसी समय मथुरा के अलावा, वृंदावन, गोकुल, महावन, कोसीकलां में जगह-जगह आजादी की जंग को लेकर सभाएं की थीं। मथुरा में गांधी ने त्यागमूर्ति, देश भक्त राजा महेंद्र प्रताप सिंह से मिले तो उन्होंने उनके प्रेम महाविद्यालय को देखकर कहा था- यह विद्यालय देखकर मन में अनेक विचार उत्पन्न हो रहे हैं, यहां ऐसी कोई चीज नहीं जो देखने लायक न हो, इसके संस्थापक को जितना भी धन्यवाद दिया जाए, थोड़ा है।
ब्रजभूमि में गायों की दशा देख हुए थे दुखी
एक बार गांधीजी अलीगढ़ मार्ग से कई स्थानों पर जनसभाएं करते हुए मथुरा पहुंचे तो, उन्हें श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने का कोई लक्षण न देख, उनको बड़ा दु:ख हुआ। उन्होंने मानपत्र के उत्तर में गोरक्षा पर अपना हृदय उड़ेल दिया। कहा कि यहां आने वाले असंख्य दर्शनार्थी इस अभिलाषा से आते हैं कि मथुरा गोपाल की जन्मभूमि है। लीला भूमि है।
यहां पर संसार की सर्वोत्तम गायें देखने को मिलेंगी, लेकिन मैं मथुरा की सड़कों से गुजरता हुआ देख रहा हूं कि गायों की हड्डियां बाहर निकल रही हैं, गायें इतना कम दूध देती हैं कि आर्थिक बोझ बन जाती हैं। इस पवित्र स्थान में मैंने बूचड़खाना भी देखा है। बालकृष्ण के प्रति उपासना का दंभ हम भरते हैं, उससे अच्छा है, अपने कर्तव्य का पालन करें।