अगस्त क्रांति की ज्वाला में जल उठा था बरहन स्टेशन, पढ़िए आजादी के दीवानों के जज्बे की दास्तां
- अगस्त क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों ने कहीं बम फेंके तो कहीं स्टेशन फूंके। सीने गोलियों से छलनी हो गए, फिर भी कदम रुके नहीं थे।आगरा में ऐसी कई घटनाएं हुई, जिनसे फिरंगी कांप गए थे।
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ताजनगरी में आजादी के लिए क्रांति की चिंगारी तो 1857 के गदर में ही भड़क गई थी। 1942 में आते-आते ज्वाला बन गई। अगस्त क्रांति में आगरा के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर दिया था। कहीं बम फेंके तो कहीं स्टेशन फूंके। इन्हीं में से एक था बरहन रेलवे स्टेशन फूंकना।
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अगस्त क्रांति आंदोलन की शुरुआत 9 अगस्त, 1942 को हुई थी। इसके पांच दिन बाद 14 अगस्त, 1942 को बरहन रेलवे स्टेशन फूंक दिया गया था। एक साथ एक हजार क्रांतिकारियों ने धावा बोला था। ये लोग आठ-दस टुकड़ियों में बंटे, फिर एक साथ हमला किया। किताब समय चक्र में इस घटना का विस्तार से उल्लेख किया गया है।
बरहन स्टेशन को तहस-नहस कर जनसमूह कस्बे की ओर बढ़ा। सरकारी गोदाम से हजार मन गल्ला लूटकर जरूरतमंद ग्रामीणों में बांट दिया गया था। गल्ला लुट जाने के बाद पुलिस आ गई। सीधे गोली चला दी। क्रांतिकारी हटे नहीं। इस फायरिंग में बैनई गांव के केवल सिंह जाटव शहीद हो गए थे। कई क्रांतिकारी घायल हुए थे।
गोलियों से छलनी थे सीने, फिर भी नहीं रुके कदम
इस घटना में एत्मादपुर के सोबरन सिंह, साहब सिंह, खौड़ा के खजान सिंह ने मातृभूमि की आजादी के लिए प्राणों की कुर्बानी दे दी थी। 31 क्रांतिकारी लहूलुहान हो गए लेकिन उनके कदम नहीं रुके, आगे बढ़ते गए। इन्हें घेराबंदी कर गिरफ्तार किया गया था।
चमरौला में पुलिस की फायरिंग में क्रांतिकारी सीताराम गर्ग, किशनलाल, सोहनलाल गुप्ता, प्यारेलाल, डूमर सिंह, बाबूराम घायल हो गए। इन्हें साथियों ने रूपधनू गांव पहुंचाया। ठाकुर उल्फत सिंह चौहान मरणासन्न हालत में थे। तीन शहीदों के पार्थिव शरीरों के साथ उन्हें रेल इंजन में रखकर टूंडला पहुंचाया गया। उनके जज्बे की दास्तां आज भी रोंगटे खड़े कर देती है।
'तुम अंग्रेजो के पिट्ठू हो... तुम्हारे हाथ का पानी नहीं पी सकता'
रास्ते में उल्फत सिंह को प्यास लगी, गला सूख रहा था, उन्होंने पानी मांगा। जब स्टेशन मास्टर पानी लेकर आया, तब उन्होंने पीने से इंकार कर दिया। कहा, तुम अंग्रेजों के पिट्ठू हो, तुम्हारे हाथ का पानी नहीं पा सकता। इस पर स्टेशन मास्टर चला गया। कई बार ऐसा हुआ, हर बार फिरंगी हुकूमत के मुलाजिम पानी लेकर पहुंचे। उल्फत ने इंकार किया। स्टेशन के आउटर पर पहुंचते-पहुंचते रणबांकुरे ने दम तोड़ दिया था।
चमरौला कांड के घायलों में सोहनलाल गुप्ता को बड़ी वेदना हो रही थी। उन्हें जान की परवाह नहीं थी लेकिन इस बात की चिंता थी कि पार्थिव शरीर कहीं अंग्रेजों के हाथ न लग जाए। उन्होंने कहा, अगर मेरा जीवन बचाने में कोई कठिनाई हो तो मिट्टी का तेल डालकर आग लगा देना लेकिन पुलिस के हाथ न आने दें। किताब 'समय चक्र' स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमदत्त पालीवाल ने इसका वर्णन किया है।
अदालत में विस्फोट से हिल गए थे फिरंगी अधिकारी
अगस्त क्रांति के समय आगरा का जिलाधीश शिवदसानी था। वो क्रांतिकारियों के प्रति क्रूर था। उसे सबक सिखाने के लिए क्रांतिकारियों ने उस पर कई बार हमला किया लेकिन वो भाग्यवश बचता रहा। एक बार उसकी कार में बम रखा। यह उस समय फट गया जब वो बाहर था।
इसके बाद क्रांतिकारियों ने उसे अदालत में उड़ा देने की योजना बनाई। क्रांतिकारियों ने एक दिन उसकी मेज पर बम रख दिया लेकिन उसके आने से पहले बम फूट गया। इससे अदालत की दीवारों का नुकसान पहुंचा, वहां रखी मुकदमों से संबंधित फाइलें जल गई। इस घटना से फिरंगी अफसर सहम गए थे।