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हिंदीहैंहम : द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की अध्यक्षता में हुई थी 500 बाल कविताओं की रचना
Sat, 29 Aug 2020 09:27 AM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sat, 29 Aug 2020 09:27 AM IST
सार
- हिंदी की इन कविताओं को स्कूलों में पढ़वाना व अंग्रेजी की कविताओं की जगह स्थापित करना उद्देश्य था
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कालजयी कविताओं के रचयिता द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो..., मुन्नी-मुन्नी ओढ़े चुन्नी, गुड़िया खूब सजाई..., जैसी कालजयी कविताओं के रचयिता द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी इनके माध्यम से बाल मन में संस्कारों का बीजारोपण करना चाहते थे। उनकी अध्यक्षता में देशभर के जाने-माने कवियों ने हिंदी में 500 बाल कविताओं की रचना की थी। इन्हें स्कूलों के कोर्स में शामिल करना और अंग्रेजी की कविताओं की जगह स्थापित करना भी उनका उद्देश्य रहा।
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वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार डॉ. राजेंद्र मिलन ने बताया कि करीब 30 वर्ष पहले केंद्रीय भाषा संस्थान, मैसूर की महिला अधिकारी ने केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में 14 दिन का शिविर लगवाया था। इसमें ऐसी बाल कविताओं की रचना की जानी थी जो अंग्रेजी की चर्चित कविताओं का स्थान ले सकें।
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कार्यशाला की अध्यक्षता द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने की थी। वो खुद, डॉ. शशि गोयल, डॉ. सुशील सरित, रोली तिवारी, सहित देश के कई नामी लोग इसमें शामिल हुए। सभी अपनी कविता सुनाते, उस पर बहस होती। अंत में अध्यक्ष का बयान हुक्मनामे की तरह होता। 14 दिन में 500 बाल कविताओं की रचना की गई। इन्हें तीन किताबों में प्रकाशित किया गया। किताबों में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की भी कविताएं थीं। डॉ. राजेंद्र मिलन की 45 कविताएं चुनीं गईं।
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कवि के साथ अच्छे गायक भी थे बाबूजी: डॉ. शशि तिवारी
चर्चित कवयित्री डॉ. शशि तिवारी का कहना है कि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी उन्हें बेटी मानते थे। वो उन्हें बाबूजी कहती थीं। वो अक्सर टहलते हुए घर आ जाते थे। हारमोनियम मंगाकर गाना शुरू कर देते। कई बार भजन तो कभी-कभी कविताओं को भी सुर के साथ गाते। वो कहते थे कि तुम्हारे घर के मोड़ पर पहुंचता हूं तो कदम अपने आप घर की ओर बढ़ जाते हैं। वो भी कभी-कभी उनके साथ गाती थीं।
'वो हमेशा लिखने की प्रेरणा देते थे'
श्रीमती बीडी जैन कॉलेज की बीएड विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष व साहित्यकार डॉ. कुसुम चतुर्वेदी का कहना है कि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी उनको पिता के समान प्रेम करते थे। बुलाने पर कई बार कॉलेजों के कार्यक्रमों में आए। हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करते। साहित्य की बारीकियां समझाते, रचनाओं में संशोधन भी किया। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने डॉ. कुसुम को अपनी ‘रचनावली’ भेंट की थी। उन्होंने हर विधा और विषय पर लिखा है।
निधन से आधा घंटा पहले पूरी की आत्मकथा
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का जन्म एक दिसंबर, 1916 को हुआ था। उनके पुत्र व आगरा कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. विनोद कुमार माहेश्वरी ने बताया कि उनका पैतृक गांव रोहता में है। यहां उनकी समाधि का निर्माण कराया गया है। जल्द वहां एक प्रतिमा लगवाई जाएगी। डॉ. विनोद माहेश्वरी ने बताया कि उनके पिता ने 29 अगस्त, 1998 को निधन से आधे घंटे पहले अपनी आत्मकथा पूरी की थी, उसे बाद में प्रकाशित कराया गया।
डॉ. विनोद माहेश्वरी का कहना है कि उनके पिता द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी हमेशा कहते थे कि प्रकृति का न्याय जरूर होता है। यदि आपके साथ अन्याय हुआ है तो अन्याय करने वाले का न्याय प्रकृति करेगी। कई मौके ऐसे आए, जिनमें उनकी बात सिद्ध हुई।
'वो हमेशा लिखने की प्रेरणा देते थे'
श्रीमती बीडी जैन कॉलेज की बीएड विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष व साहित्यकार डॉ. कुसुम चतुर्वेदी का कहना है कि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी उनको पिता के समान प्रेम करते थे। बुलाने पर कई बार कॉलेजों के कार्यक्रमों में आए। हमेशा लिखने के लिए प्रेरित करते। साहित्य की बारीकियां समझाते, रचनाओं में संशोधन भी किया। द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ने डॉ. कुसुम को अपनी ‘रचनावली’ भेंट की थी। उन्होंने हर विधा और विषय पर लिखा है।
निधन से आधा घंटा पहले पूरी की आत्मकथा
द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी का जन्म एक दिसंबर, 1916 को हुआ था। उनके पुत्र व आगरा कॉलेज के पूर्व प्राचार्य डॉ. विनोद कुमार माहेश्वरी ने बताया कि उनका पैतृक गांव रोहता में है। यहां उनकी समाधि का निर्माण कराया गया है। जल्द वहां एक प्रतिमा लगवाई जाएगी। डॉ. विनोद माहेश्वरी ने बताया कि उनके पिता ने 29 अगस्त, 1998 को निधन से आधे घंटे पहले अपनी आत्मकथा पूरी की थी, उसे बाद में प्रकाशित कराया गया।
डॉ. विनोद माहेश्वरी का कहना है कि उनके पिता द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी हमेशा कहते थे कि प्रकृति का न्याय जरूर होता है। यदि आपके साथ अन्याय हुआ है तो अन्याय करने वाले का न्याय प्रकृति करेगी। कई मौके ऐसे आए, जिनमें उनकी बात सिद्ध हुई।