UP: छोटी काशी के रूप में मशहूर बटेश्वर, पुराणों में भी जिक्र, तुलसीदास ने यहां बैठ लिखे थे दोहे और चौपाइयां
छोटी काशी के नाम से मशहूर आगरा के बटेश्वर का पुराणों में भी जिक्र है। यहां वट वृक्ष के नीचे बैठकर तुलसीदास ने रामचरित मानस के कुछ दोहे और चौपाइयां लिखी थीं।
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मस्थान आगरा का बटेश्वर, पुराणों में भी दर्ज है। कला, संस्कृति और धर्म के बड़े केंद्र के रूप में चर्चित बटेश्वर को छोटी काशी भी कहा जाता है। यमुना नदी का प्रवाह सिर्फ यहीं पर पश्चिम की ओर है। तट पर 101 शिवालयों के बटेश्वर को शिवजी का प्रमुख तीर्थ माना जाता है।
वटवृक्ष के कारण नाम पड़ा बटेश्वर
बटेश्वर में प्राचीन शिव मंदिर वट वृक्ष के नीचे थे, इसलिए इसका नाम बटेश्वर रखा गया। 1980 में प्रकाशित आगरा जनपद का राजनैतिक इतिहास (लेखक प्रो.चिंतामणि शुक्ल, मथुरा) के अनुसार यह रामायण कालीन तीर्थ है। सती अनुसुइया और शबरी की तपोस्थली भी यह रही है।
इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से यमुनोत्री की ओर यात्रा पर निकले गोस्वामी तुलसीदास ने बाह के पारना गांव में यमुना नदी के किनारे हनुमान प्रतिमा स्थापित की। वृक्ष के नीचे बैठकर रामचरित मानस के कुछ दोहे और चौपाइयां लिखी थीं। पारना में हनुमान मंदिर आज भी मौजूद है और यहां मेला भी लगता है। भागवत पुराण के मुताबिक बटेश्वर का शौरीपुर भगवान श्रीकृष्ण के पूर्वजों की राजधानी थी। यहां से वासुदेव की बरात मथुरा गई थी।
लखनऊ के संग्रहालय में है शिलालेख
ब्रिटिश इंजीनियर एलेक्जेंडर कनिंघम को पुरातत्व सर्वे के दौरान बटेश्वर में एक शिलालेख मिला था, जो लखनऊ संग्रहालय में है। यह शिलालेख संवत 1212 आश्विन शुक्ल पंचमी, दिन रविवार का है। इसके अनुसार यहां बटेश्वर में राजा परमर्दिदेव ने स्फटिक के समान सफेद पत्थर का एक सुंदर मंदिर बनवाया था। शिलालेख के 25, 26 और 34 वे श्लोक में लिखा है कि उस राजा परमार्दिदेव ने राज प्रासाद बनवाया था, जिसमें भगवान विष्णु की प्रतिमा थी, जिनके चरणों में वह प्रतिदिन नत मस्तक होता था।
विदेशी इतिहासकारों ने बताया आलीशान नगर
ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी कर्नल जेम्स टॉड ने अपनी राजस्थान नामक पुस्तक में यूनानी यात्री मेगस्थनीज कृत एरियन के आधार पर शौरीपुर और बटेश्वर का उल्लेख किया है। लिखा है कि यमुना के दाहिने तट पर बसा यह समृद्धिशाली सुंदर व्यापारिक शहर है। ब्रिटिश इतिहासकार कार्ट लार्ड भी यहां आए, उन्होंने यहां खोज की और फिर लिखा कि किसी जमाने में यह बहुत आलीशान नगर रहा होगा। इतिहासकार कार्लाइल ने 1870 में बटेश्वर में सिक्के, बर्तन, ताम्रपत्र, शिलालेख निकाले थे।
इन पुराणों में दर्ज है बटेश्वर
- गर्ग मुनि की गर्ग संहिता में बटेश्वर को पुण्य तीर्थ बताया है। लिखा है कि कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को बटेश्वर की यमुना में स्नान करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।
- अत्रि मुनि की ओर से पूछे गए प्रश्न के उत्तर में भगवान शंकर कहते हैं कि धरती में श्रेष्ठ, संपूर्ण देवताओं का आश्रम, ब्रजमंडल के मध्य बटेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है।
- डॉ. प्रणवीर सिंह चौहान ने लिखा है कि प्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ अवदान कल्पलता में बटेश्वर पर एक श्लोक लिखा है- रेणुका शुकरः काशी काली काल बटेश्वरम्। कालिंजर महाकाल उक्खला नव प्रकीर्त्यु ।।
- चक्र ग्रंथ में बटेश्वर पर लिखा है कि सूरसेन थ राजर्षिः श्रुत्वा नंदागमं विभु। भगवान तत्समीपं च प्रणमामि पुनः पुनः।।
- व्यास जी की ओर से सृजित मंगलाभिषेक के श्लोक में बटेश्वर का नाम बद्रीनाथ के साथ लिखा गया है- ऊं त्वंग प्रभा पत्र करू चक्र पुष्करम्, या विभिक्तो बद्री बटेश्वरः।
- 13 वीं शताब्दी में कवि जगनिक ने परमाल रासो में बटेश्वर के बारे में लिखा है। कवि चंदवरदाई ने लिखा है कि पृथ्वीराज चौहान मलिखान पर आक्रमण के लिए जब गए, तब बटेश्वर आया था। कूंच कियो उज्जैन तैं, दरस बट्टेसुर चाह, संभीर दे वाई सर्वे, बटेसुर लै राह।