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UP: लाइसेंस डाक में गायब, फिर भरने पड़ रहे 400 रुपये; आवेदक आरटीओ के चक्कर काटने को मजबूर
Fri, 26 Jun 2026 09:32 AM IST
Dhirendra Singh
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: Dhirendra Singh
Updated Fri, 26 Jun 2026 09:32 AM IST
सार
आगरा में ड्राइविंग लाइसेंस बनने के बाद भी कई आवेदकों को 10 दिन की जगह एक माह से अधिक इंतजार करना पड़ रहा है। कई मामलों में लाइसेंस डाक में गुम होने पर दोबारा 400 रुपये जमा कर री-लाइसेंस मंगवाना पड़ रहा है।
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आगरा आरटीओ
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
संभागीय परिवहन विभाग की तरफ से सभी प्रक्रिया पूरी होने के बाद 10 दिन में डाक से घर पर ड्राइविंग लाइसेंस आने का नियम है। हर माह कई आवेदकों को एक माह से भी अधिक समय इंतजार करना पड़ता है। कभी डाक के माध्यम से रास्ते में लाइसेंस गुम हो जाता है, तो कभी लखनऊ से प्रिंट नहीं होता है। आवेदक आरटीओ के चक्कर लगाने को मजबूर होते हैं।
ड्राइविंग लाइसेंस की प्रक्रिया शासन स्तर से ऑनलाइन कर दी गई है। फिर भी आवेदकों को परेशानी झेलनी पड़ती है। हर माह 25 से अधिक मामले लाइसेंस न मिलने के आरटीओ कार्यालय में आते हैं। इसके बाद भी कोई स्थायी समाधान नहीं किया जाता है। आवेदक लाइसेंस के लिए आवेदन करने के बाद वाहन चलाने का टेस्ट देता है।
यह टेस्ट उत्तीर्ण करने के बाद लखनऊ से लाइसेंस प्रिंट होकर आवेदक के पते पर भेजने का दावा किया जाता है। यहीं से देरी का सिलसिला शुरू हो जाता है। नियम से 10 दिन के अंदर डाक से आवेदक को लाइसेंस मिल जाना चाहिए लेकिन कई आवेदकों को एक माह से अधिक समय तक लाइसेंस नहीं मिलता है। कई बार तो लाइसेंस न मिलने की स्थिति में आवेदक को दोबारा 400 रुपये जमा कराने पड़ते हैं, तब री-लाइसेंस भेजा जाता है।
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एआरटीओ (प्रशासन) विनय कुमार सिंह बताते हैं कि ड्राइविंग लाइसेंस प्रिंट करने की प्रक्रिया लखनऊ से होती है। इस मामले में स्थानीय स्तर पर कुछ नहीं किया जा सकता है। कई बार आवेदक पता गलत अंकित कर देते हैं, जिसकी वजह से लाइसेंस अटक जाता है।
पहले कार्यालय आते थे लाइसेंस
किसी आवेदक का पता गलत होने पर ड्राइविंग लाइसेंस लखनऊ डाक से वापस लौट जाते थे। वहां से यह लाइसेंस आरटीओ कार्यालय भेज दिए जाते थे। जब कोई आवेदक लाइसेंस की जानकारी करने आता था, तो उसे भटकना नहीं पड़ता था। अब लखनऊ से एक माह में मुश्किल से दो से पांच लाइसेंस कार्यालय भेजे जा रहे हैं। इससे परेशानी खड़ी हो रही है।
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ड्राइविंग लाइसेंस की प्रक्रिया शासन स्तर से ऑनलाइन कर दी गई है। फिर भी आवेदकों को परेशानी झेलनी पड़ती है। हर माह 25 से अधिक मामले लाइसेंस न मिलने के आरटीओ कार्यालय में आते हैं। इसके बाद भी कोई स्थायी समाधान नहीं किया जाता है। आवेदक लाइसेंस के लिए आवेदन करने के बाद वाहन चलाने का टेस्ट देता है।
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यह टेस्ट उत्तीर्ण करने के बाद लखनऊ से लाइसेंस प्रिंट होकर आवेदक के पते पर भेजने का दावा किया जाता है। यहीं से देरी का सिलसिला शुरू हो जाता है। नियम से 10 दिन के अंदर डाक से आवेदक को लाइसेंस मिल जाना चाहिए लेकिन कई आवेदकों को एक माह से अधिक समय तक लाइसेंस नहीं मिलता है। कई बार तो लाइसेंस न मिलने की स्थिति में आवेदक को दोबारा 400 रुपये जमा कराने पड़ते हैं, तब री-लाइसेंस भेजा जाता है।
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एआरटीओ (प्रशासन) विनय कुमार सिंह बताते हैं कि ड्राइविंग लाइसेंस प्रिंट करने की प्रक्रिया लखनऊ से होती है। इस मामले में स्थानीय स्तर पर कुछ नहीं किया जा सकता है। कई बार आवेदक पता गलत अंकित कर देते हैं, जिसकी वजह से लाइसेंस अटक जाता है।
पहले कार्यालय आते थे लाइसेंस
किसी आवेदक का पता गलत होने पर ड्राइविंग लाइसेंस लखनऊ डाक से वापस लौट जाते थे। वहां से यह लाइसेंस आरटीओ कार्यालय भेज दिए जाते थे। जब कोई आवेदक लाइसेंस की जानकारी करने आता था, तो उसे भटकना नहीं पड़ता था। अब लखनऊ से एक माह में मुश्किल से दो से पांच लाइसेंस कार्यालय भेजे जा रहे हैं। इससे परेशानी खड़ी हो रही है।