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डा. ऊषा यादव को मिला पदमश्री सम्मान
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आगरा। राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में डॉ. ऊषा यादव को पदमश्री प्रदान करते राष्ट्रपति रा
- फोटो : Agra City
आगरा। देश की जानी-मानी साहित्यकार डॉ. ऊषा यादव को मंगलवार शाम राष्ट्रपति भवन में हिंदी साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। उन्हें यह सम्मान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दिया। डॉ. यादव की इस उपलब्धि से शहर का साहित्य जगत गदगद है। पुरस्कारों की घोषणा इस साल जनवरी में हुई थी लेकिन कोरोना संक्रमण के चलते इन्हें टाल दिया गया था। अब संक्रमण की रफ्तार कुछ कम हुई है तो मंगलवार शाम पांच बजे से राष्ट्रपति भवन में भव्य आयोजन हुआ। समारोह में आगरा का प्रतिनिधित्व डॉ. ऊषा यादव ने किया।
डॉ. यादव मूल रूप से कानपुर की रहने वाली हैं। उनके पिता मशहूर बाल साहित्यकार चंद्रपाल सिंह थे। पिता के मार्गदर्शन में ही साहित्य के प्रति उनका रुझान बढ़ा। आगरा में नॉर्थ ईदगाह कॉलोनी में निवासरत डॉ. यादव ने डॉ. भीमराव आंबेडकर विवि के केएमआई और केंद्रीय हिंदी संस्थान में भी शिक्षण कार्य किया। मंगलवार शाम राष्ट्रपति भवन में वे अपने पति डॉ. आरके सिंह व बेटी डॉ. कामना सिंह के साथ पहुंचीं थीं।
डॉ. ऊषा यादव से पूर्व साहित्य के क्षेत्र में शहर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरिशंकर शर्मा को पद्मश्री से नवाजा गया था। जरदोजी में शमसुद्दीन, दरी उद्योग में हरिकृष्ण बातल, वर्ष 2010 में साहित्यकार स्व. लाल बहादुर सिंह चौहान, वर्ष 2014 में एसएन मेडिकल कालेज के विभागाध्यक्ष डॉ. डीके हाजरा व जरदोजी में ही फजल मोहम्मद को पद्मश्री मिल चुका है।
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डॉ. यादव की पहचान बतौर बाल साहित्यकार है। पांच दशक से निरंतर चल रहे अपने साहित्यिक जीवन में उन्होंने 100 से अधिक किताबें लिखी हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ से बाल साहित्य का सर्वोच्च सम्मान बाल साहित्य भारती तथा विश्वविद्यालय स्तरीय सम्मान भी प्राप्त हुआ। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी ने उन्हें उपन्यास काहे री नलिनी को अखिल भारतीय वीर सिंह देव पुरस्कार प्रदान किया। डॉ. यादव ने बाल साहित्य, उपन्यास, नाटक, कहानी, आलोचना, कला एवं संस्कृति, शोध, कविता संग्रह सहित अन्य साहित्यिक विधाओं में लेखन कार्य किया है।
अमर उजाला से फोन पर बातचीत करते हुए डॉ. यादव ने बताया कि नौ वर्ष की आयु में उनकी पहली कविता स्कूल की डायरी में प्रकाशित हुई थी। पिता का सानिध्य मिला और लेखन कार्य शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने की अनुभूति बहुत ही सुखद रही। उनकी इस साहित्यिक यात्रा में पति डॉ. आरके सिंह व परिवार के अन्य सदस्यों का काफी योगदान है।
शहर के साहित्यिक जगत के लिए बड़ी उपलब्धि है। डॉ. ऊषा यादव को बहुत शुभकामनाएं। उन्होंने एक बार फिर सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। उनका साहित्यिक योगदान काबिल-ए-तारीफ है। - डॉ. शशि तिवारी (कवियत्री)
बाल साहित्य ही नहीं, डॉ. ऊषा यादव ने साहित्य की हर विधा पर लेखन कार्य किया है। यह पूरे शहर के लिए गौरव का पल है। उनका अपार बधाइयां। उनके पति डॉ. आरके सिंह के निर्देशन में ही मैंने पीएचडी की है। - डॉ. मधु भारद्वाज (साहित्यकार)
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डॉ. यादव मूल रूप से कानपुर की रहने वाली हैं। उनके पिता मशहूर बाल साहित्यकार चंद्रपाल सिंह थे। पिता के मार्गदर्शन में ही साहित्य के प्रति उनका रुझान बढ़ा। आगरा में नॉर्थ ईदगाह कॉलोनी में निवासरत डॉ. यादव ने डॉ. भीमराव आंबेडकर विवि के केएमआई और केंद्रीय हिंदी संस्थान में भी शिक्षण कार्य किया। मंगलवार शाम राष्ट्रपति भवन में वे अपने पति डॉ. आरके सिंह व बेटी डॉ. कामना सिंह के साथ पहुंचीं थीं।
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डॉ. ऊषा यादव से पूर्व साहित्य के क्षेत्र में शहर के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरिशंकर शर्मा को पद्मश्री से नवाजा गया था। जरदोजी में शमसुद्दीन, दरी उद्योग में हरिकृष्ण बातल, वर्ष 2010 में साहित्यकार स्व. लाल बहादुर सिंह चौहान, वर्ष 2014 में एसएन मेडिकल कालेज के विभागाध्यक्ष डॉ. डीके हाजरा व जरदोजी में ही फजल मोहम्मद को पद्मश्री मिल चुका है।
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डॉ. यादव की पहचान बतौर बाल साहित्यकार है। पांच दशक से निरंतर चल रहे अपने साहित्यिक जीवन में उन्होंने 100 से अधिक किताबें लिखी हैं। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ से बाल साहित्य का सर्वोच्च सम्मान बाल साहित्य भारती तथा विश्वविद्यालय स्तरीय सम्मान भी प्राप्त हुआ। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी ने उन्हें उपन्यास काहे री नलिनी को अखिल भारतीय वीर सिंह देव पुरस्कार प्रदान किया। डॉ. यादव ने बाल साहित्य, उपन्यास, नाटक, कहानी, आलोचना, कला एवं संस्कृति, शोध, कविता संग्रह सहित अन्य साहित्यिक विधाओं में लेखन कार्य किया है।
अमर उजाला से फोन पर बातचीत करते हुए डॉ. यादव ने बताया कि नौ वर्ष की आयु में उनकी पहली कविता स्कूल की डायरी में प्रकाशित हुई थी। पिता का सानिध्य मिला और लेखन कार्य शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के हाथों पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने की अनुभूति बहुत ही सुखद रही। उनकी इस साहित्यिक यात्रा में पति डॉ. आरके सिंह व परिवार के अन्य सदस्यों का काफी योगदान है।
शहर के साहित्यिक जगत के लिए बड़ी उपलब्धि है। डॉ. ऊषा यादव को बहुत शुभकामनाएं। उन्होंने एक बार फिर सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। उनका साहित्यिक योगदान काबिल-ए-तारीफ है। - डॉ. शशि तिवारी (कवियत्री)
बाल साहित्य ही नहीं, डॉ. ऊषा यादव ने साहित्य की हर विधा पर लेखन कार्य किया है। यह पूरे शहर के लिए गौरव का पल है। उनका अपार बधाइयां। उनके पति डॉ. आरके सिंह के निर्देशन में ही मैंने पीएचडी की है। - डॉ. मधु भारद्वाज (साहित्यकार)