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UP: मुमताज के पहले उर्स में एक लाख का दान...बनवाई सोने की जाली, जानें 394 साल पुरानी ताज से जुड़ी ये जानकारी
Sun, 04 Jan 2026 02:48 AM IST
आगरा ब्यूरो
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
Published by: आगरा ब्यूरो
Updated Sun, 04 Jan 2026 02:48 AM IST
सार
मुमताज के उर्स 14 साल तक लगातार चले, लेकिन शाहजहां के वर्ष 1658 में कैद में जाने के बाद कोई ब्योरा नहीं मिलता। शाहजहां का उर्स वर्ष 1666 में उनकी मृत्यु के बाद शुरू किया गया जो अब तक जारी है।
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एआई से समझें ताजमहल मे मुमताज महल का पहला उर्स।
- फोटो : एआई
ताजमहल में शहंशाह शाहजहां का उर्स 15 से 17 जनवरी तक मनाया जाएगा। इस दौरान तीनों दिन ताजमहल में सैलानियों को निशुल्क प्रवेश मिलेगा। साथ ही सैलानी तहखाने में मौजूद शाहजहां-मुमताज की असली कब्रों को देख सकेंगे। ताज में उर्स की दास्तान 394 साल पुरानी है। शाहजहां से पहले उनकी बेगम मुमताज महल का पहला उर्स 22 जून 1632 को फोरकोर्ट में मनाया गया था। इसमें गरीबों को एक लाख रुपये का दान दिया गया था।
एआई से समझें ताजमहल मे मुमताज महल का पहला उर्स।
- फोटो : एआई
आस्ट्रियाई इतिहासकार एबा कोच ने अपनी किताब ‘द कंप्लीट ताजमहल एंड द रिवरफ्रंट गार्डन्स ऑफ आगरा’ में लिखा है कि ईरानी इतिहासकार जलालुद्दीन ने उर्स का ब्योरा दिया है। इसमें दर्ज है कि जनवरी, 1632 में बुरहानपुर से मुमताज महल का शव आगरा लाया गया था। मुमताज के पहले उर्स में 22 जून, 1632 को शाहजहां, मुमताज के पिता आसफ खां, ईरानी राजदूत मुहम्मद अली बेग के साथ देशभर के अमीर और मनसबदार सफेद लिबास में आए और अपने रैंक के मुताबिक बैठे।
एआई से समझें ताजमहल मे मुमताज महल का पहला उर्स।
- फोटो : एआई
शाहजहां ने कुरान की आयतें पढ़ने के साथ मुमताज के लिए फातिहा पढ़ा। तब बादशाह ने 50 हजार रुपये और शाही परिवार की महिलाओं ने गरीबों को 50 हजार रुपये बांटे और तय किया कि हर साल एक लाख रुपये गरीबों को दिए जाएंगे। एबा कोच की पुस्तक के मुताबिक 26 मई, 1633 को मुमताज के दूसरे उर्स पर मकबरे का निचला तल बनकर तैयार हो गया था। शाम को आगरा किला से नाव के जरिये यमुना किनारे शाहजहां, जहांआरा और शाही परिवार के सदस्य आए और अस्थायी सीढ़ियों से ऊपर चढ़े और फातिहा पढ़ी।
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एआई से समझें ताजमहल मे मुमताज महल का पहला उर्स।
- फोटो : एआई
शाही सुनारों के अधीक्षक बिबादल खान ने 6 लाख रुपये की लागत से सोने की जाली बनाई थी, जिसे कब्र के चारों ओर रखा गया था। वर्ष 1643 में सोने की जाली को मौजूदा संगमरमरी जाली से बदल दिया गया। मुमताज के उर्स 14 साल तक लगातार चले, लेकिन शाहजहां के वर्ष 1658 में कैद में जाने के बाद कोई ब्योरा नहीं मिलता। शाहजहां का उर्स वर्ष 1666 में उनकी मृत्यु के बाद शुरू किया गया जो अब तक जारी है।
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एआई से समझें ताजमहल मे मुमताज महल का पहला उर्स।
- फोटो : एआई
बिछाए कालीन और सफेद रंग के तंबू लगाए
यमुना किनारे दूसरे उर्स में मकबरे पर दफन के बाद सफेद संगमरमर का चबूतरा बनाया जा चुका था। तब फर्श को कालीन से ढका गया, जबकि सफेद रंग के बड़े-बड़े तंबू लगाए गए। एक हजार लोग यहां आए थे। सोने की जाली पर फूलों की नक्काशी की गई और सोने के गोले तथा दीपक बनाए गए। पीटर मुंडी ने वर्ष 1633 में लिखा था कि कब्र के चारों ओर पहले से ही सोने की एक रेलिंग है। शहंशाह ने तब पूरे देश से आए धार्मिक लोगों को कपड़े और धन भेंट में दिया था।
यमुना किनारे दूसरे उर्स में मकबरे पर दफन के बाद सफेद संगमरमर का चबूतरा बनाया जा चुका था। तब फर्श को कालीन से ढका गया, जबकि सफेद रंग के बड़े-बड़े तंबू लगाए गए। एक हजार लोग यहां आए थे। सोने की जाली पर फूलों की नक्काशी की गई और सोने के गोले तथा दीपक बनाए गए। पीटर मुंडी ने वर्ष 1633 में लिखा था कि कब्र के चारों ओर पहले से ही सोने की एक रेलिंग है। शहंशाह ने तब पूरे देश से आए धार्मिक लोगों को कपड़े और धन भेंट में दिया था।