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बुढ़िया का ताल: 60 लाख से अधिक खर्च होने के बाद भी स्मारक बदहाल, बारिश में भी पानी नहीं हुआ नसीब
Sun, 05 Jul 2026 01:32 PM IST
Arun Parashar
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा
Published by: Arun Parashar
Updated Sun, 05 Jul 2026 01:32 PM IST
सार
आगरा में बुढि़या का ताल स्मारक 60 लाख रुपये खर्च होने के बाद भी नहीं संवारा जा सका है। बारिश में भी ताल सूखा पड़ा है। अब एएसआई की ओर से स्मारक के फिर से संरक्षण करने की बात कही जा रही है।
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बुढि़या का ताल।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
आगरा के एत्मादपुर में हाईवे किनारे मौजूद बुढ़िया का ताल स्मारक को मूल स्वरूप में लाने और संवारने के लिए चार साल पहले कवायद की गई, लेकिन संवरने की जगह यह स्मारक और बदहाल हो गया। 20 मीटर चौड़ी और 6 फीट गहरी नहर बनाकर बुढि़या के ताल को मूल स्वरूप में लाने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने काम कराया था। हालांकि, बारिश में भी यह ताल सूखा है, जबकि आजादी के 75वें साल पर इसे अमृत सरोवर के रूप में चिह्नित किया गया था। इसके संरक्षण पर 60 लाख से ज्यादा रुपये खर्च हो चुके हैं।
वर्ष 2022 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. राजकुमार पटेल ने वर्ष 1814-15 में सीताराम की पेंटिंग के आधार पर बुढि़या के ताल को संवारने और मूल स्वरूप में लाने की योजना बनाई थी। तब स्मारक के चारों ओर छह से सात फीट मिट्टी हटाकर यहां पानी भरा गया। पहले चरण में इसे 20 मीटर चौड़ा बनाया गया, जिसे अगले चरणों में 20-20 मीटर बढ़ाया जाना था। पेड़ों को काटने पर प्रतिबंध के कारण यह काम बीच में ही रोक दिया गया। अब यह स्मारक और बदहाल हो गया है। पानी न होने के कारण ताल सूख चुका है। अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. स्मिथा एस कुमार ने बताया कि ताल की बाउंड्री के निर्माण का इस साल प्रस्ताव है। इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। पूर्व में चल रही योजनाओं की समीक्षा की जाएगी।
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वर्ष 2022 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. राजकुमार पटेल ने वर्ष 1814-15 में सीताराम की पेंटिंग के आधार पर बुढि़या के ताल को संवारने और मूल स्वरूप में लाने की योजना बनाई थी। तब स्मारक के चारों ओर छह से सात फीट मिट्टी हटाकर यहां पानी भरा गया। पहले चरण में इसे 20 मीटर चौड़ा बनाया गया, जिसे अगले चरणों में 20-20 मीटर बढ़ाया जाना था। पेड़ों को काटने पर प्रतिबंध के कारण यह काम बीच में ही रोक दिया गया। अब यह स्मारक और बदहाल हो गया है। पानी न होने के कारण ताल सूख चुका है। अधीक्षण पुरातत्वविद डॉ. स्मिथा एस कुमार ने बताया कि ताल की बाउंड्री के निर्माण का इस साल प्रस्ताव है। इसके संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। पूर्व में चल रही योजनाओं की समीक्षा की जाएगी।
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भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षित स्मारक बुढ़िया के ताल को ईको टूरिज्म का केंद्र बनाने की फाइल चार साल बाद फिर से पर्यटन विभाग ने निकाली है। इससे पूर्व वर्ष 2022 में भी क्षेत्रीय विधायक डॉ. धर्मपाल सिंह ने लखनऊ तक जाकर बुढ़िया के ताल को अमृत सरोवर के रूप में संरक्षित करके संवारने की कवायद की थी, लेकिन योजना परवान नहीं चढ़ सकी। क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी शक्ति सिंह के मुताबिक बुढि़या के ताल को ईको टूरिज्म केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।
212 साल पहले की पेंटिंग में लबालब भरा ताल
बंगाल के गवर्नर जनरल मार्केस ऑफ हेस्टिंग्स के साथ कोलकाता से दिल्ली तक के सफर में कलाकार सीताराम ने वर्ष 1814-15 में बुढ़िया के ताल की पेंटिंग तैयार की। इसमें ताल पानी से लबालब भरा है और किनारे पर देसी पेड़ लगे दिखते हैं। यहां चावली और एत्मादपुर माइनर से पानी पहुंचता था। बुढ़िया का ताल में वर्ष 1592 में दो मंजिला अष्टभुजाकार भवन को मुगल बादशाह अकबर के दरबारी इत्माद खान ने बनवाया था। यहीं उनका मकबरा भी है और तालाब के पास पांच पक्के घाटों के अवशेष हैं। तालाब की खुदाई में पूर्व में बौद्धकालीन मूर्तियां भी प्राप्त हुई थीं।
अस्तित्व के संकट से जूझ रहे दो अन्य ताल
ग्वालियर रोड पर बना ताल फिरोज खां भी बुढि़या का ताल की तरह अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है। गुरु का ताल संरक्षित है, लेकिन यह कई साल पहले ही सूख चुका है। एएसआई ने एक बार भी इसका संरक्षण नहीं किया।
बंगाल के गवर्नर जनरल मार्केस ऑफ हेस्टिंग्स के साथ कोलकाता से दिल्ली तक के सफर में कलाकार सीताराम ने वर्ष 1814-15 में बुढ़िया के ताल की पेंटिंग तैयार की। इसमें ताल पानी से लबालब भरा है और किनारे पर देसी पेड़ लगे दिखते हैं। यहां चावली और एत्मादपुर माइनर से पानी पहुंचता था। बुढ़िया का ताल में वर्ष 1592 में दो मंजिला अष्टभुजाकार भवन को मुगल बादशाह अकबर के दरबारी इत्माद खान ने बनवाया था। यहीं उनका मकबरा भी है और तालाब के पास पांच पक्के घाटों के अवशेष हैं। तालाब की खुदाई में पूर्व में बौद्धकालीन मूर्तियां भी प्राप्त हुई थीं।
अस्तित्व के संकट से जूझ रहे दो अन्य ताल
ग्वालियर रोड पर बना ताल फिरोज खां भी बुढि़या का ताल की तरह अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रहा है। गुरु का ताल संरक्षित है, लेकिन यह कई साल पहले ही सूख चुका है। एएसआई ने एक बार भी इसका संरक्षण नहीं किया।