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अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिखेगी आगरा की भगत
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भगत नाट्य शैली
- फोटो : Agra City
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आगरा।
दुनियाभर में अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही आगरा की भगत दिवाली पर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी। देश-दुनिया में घर-घर तक भगत को पहुंचाने की मुहिम के तहत रंगलीला संस्था ने यह फैसला लिया है।
संस्था के संस्थापक निर्देशक अनिल शुक्ल का कहना है कि भगत के प्रशंसकों को सोशल मीडिया पर 20 मिनट के छह एपीसोड दिखने को मिलेंगे। इसका पहला एपीसोड दिवाली पर प्रसारित किया जाएगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भगत को लाने का मकसद इस विधा से ज्यादा से ज्याद लोगों को जोड़ना है।
संस्था के पदाधिकारियों का मानना है कि इस नए प्रयोग से भगत की तैयारी में लगने वाले खर्चे आसानी से निकल सकेंगे। कलाकारों का पारिश्रमिक, वेशभूषा, आभूषण, शृंगार, मंच सज्जा आदि के खर्चे शामिल हैं। एक एपीसोड में भगत के कम से कम दस और ज्यादा से ज्यादा 22 कलाकार दिखाई देंगे।
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बदलते परिवेश में डिजिटल पर आने का फैसला
अनिल शुक्ल का कहना है कि लंबे समय तक हम डिजिटल मोड के पक्ष में नहीं थे। भगत एक जीवंत, प्रस्तुत करने वाली कला है। शताब्दियों से यह आम दर्शकों के बीच में जाकर होती रही है। इसे फिर से जीवित किया जा रहा है। हमारी कोशिशों को कोरोनाकाल ने झटका दिया। भगत को लेकर कार्ययोजना भी अटकी हुई है। इसलिए इसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाकर घर-घर तक पहुंचाने का फैसला लिया।
इन पर होंगे छह एपीसोड
- मेरे बाबुल का बीजना
- वध विरुद्ध
- संगत कीजिए साधु की
- कल का इंडिया
- क से कबूतर
- आज का भारत
400 साल पुरानी लोक नाट्य कला
‘भगत’ आगरा में जन्मी 400 साल पुरानी लोक नाट्य कला है। यह मूलत: तत्कालीन सामंतों और अभिजात्यों की जीवनशैली को लेकर किए जाने वाले व्यंग्य होते थे। इसे भांड जनजाति के लोक कलाकारों ने विकसित किया था। इस कारण ये ‘भांड भगत’ कहलाती थी। मुगलकाल में इस पर रोक लगा दी गई। सन् 1827 में इसे नए सिरे से शुरू किया गया। इस बार इसके जनक मोतीकटरा मोहल्ले के भांड जनजाति के कवि और लोक कलाकार जौहरी राय थे। पूर्णत: गायन परंपरा वाली इस नाट्य विधा के धीरे-धीरे आगरा के विभिन्न मोहल्लों में अखाड़े स्थापित होते चले गए। बाद के समय में यह मथुरा और हाथरस तक भी पहुंची। 1870 का दशक आते-आते भगत विलुप्त हो गई थी। आगरा की नाट्य संस्था रंगलीला ने इसे दोबारा शुरू किया।
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दुनियाभर में अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही आगरा की भगत दिवाली पर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होगी। देश-दुनिया में घर-घर तक भगत को पहुंचाने की मुहिम के तहत रंगलीला संस्था ने यह फैसला लिया है।
संस्था के संस्थापक निर्देशक अनिल शुक्ल का कहना है कि भगत के प्रशंसकों को सोशल मीडिया पर 20 मिनट के छह एपीसोड दिखने को मिलेंगे। इसका पहला एपीसोड दिवाली पर प्रसारित किया जाएगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भगत को लाने का मकसद इस विधा से ज्यादा से ज्याद लोगों को जोड़ना है।
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संस्था के पदाधिकारियों का मानना है कि इस नए प्रयोग से भगत की तैयारी में लगने वाले खर्चे आसानी से निकल सकेंगे। कलाकारों का पारिश्रमिक, वेशभूषा, आभूषण, शृंगार, मंच सज्जा आदि के खर्चे शामिल हैं। एक एपीसोड में भगत के कम से कम दस और ज्यादा से ज्यादा 22 कलाकार दिखाई देंगे।
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बदलते परिवेश में डिजिटल पर आने का फैसला
अनिल शुक्ल का कहना है कि लंबे समय तक हम डिजिटल मोड के पक्ष में नहीं थे। भगत एक जीवंत, प्रस्तुत करने वाली कला है। शताब्दियों से यह आम दर्शकों के बीच में जाकर होती रही है। इसे फिर से जीवित किया जा रहा है। हमारी कोशिशों को कोरोनाकाल ने झटका दिया। भगत को लेकर कार्ययोजना भी अटकी हुई है। इसलिए इसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाकर घर-घर तक पहुंचाने का फैसला लिया।
इन पर होंगे छह एपीसोड
- मेरे बाबुल का बीजना
- वध विरुद्ध
- संगत कीजिए साधु की
- कल का इंडिया
- क से कबूतर
- आज का भारत
400 साल पुरानी लोक नाट्य कला
‘भगत’ आगरा में जन्मी 400 साल पुरानी लोक नाट्य कला है। यह मूलत: तत्कालीन सामंतों और अभिजात्यों की जीवनशैली को लेकर किए जाने वाले व्यंग्य होते थे। इसे भांड जनजाति के लोक कलाकारों ने विकसित किया था। इस कारण ये ‘भांड भगत’ कहलाती थी। मुगलकाल में इस पर रोक लगा दी गई। सन् 1827 में इसे नए सिरे से शुरू किया गया। इस बार इसके जनक मोतीकटरा मोहल्ले के भांड जनजाति के कवि और लोक कलाकार जौहरी राय थे। पूर्णत: गायन परंपरा वाली इस नाट्य विधा के धीरे-धीरे आगरा के विभिन्न मोहल्लों में अखाड़े स्थापित होते चले गए। बाद के समय में यह मथुरा और हाथरस तक भी पहुंची। 1870 का दशक आते-आते भगत विलुप्त हो गई थी। आगरा की नाट्य संस्था रंगलीला ने इसे दोबारा शुरू किया।