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अपराजिताः खुद को किया साबित...जो ठान लिया बनकर दिखाया, रेलवे में गार्ड से लेकर ट्रेन चला रहीं बेटियां

Wed, 19 Aug 2020 05:51 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Wed, 19 Aug 2020 05:51 PM IST
सार

महिलाओं को मौका देकर देखिए, कोई भी काम असंभव नहीं है, ट्रेन चलाती हूं तो गर्व महसूस होता है, बहनों से प्रेरित होकर बनी अफसर, शुरुआत में आईं मुश्किलें, अब सब आसान
 

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Aparajita 100 Million Smiles Success Story Of Women In Railways
अपराजिताः रेलवे में नौकरी करने वाली शिल्पी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

आगरा रेल मंडल में ट्रेनों का संचालन अब सिर्फ पुरुषों के हाथ में नहीं है। महिलाएं गार्ड से लेकर ट्रेन को चलाने तक का काम कर रही हैं। इनके लिए यह आसान नहीं रहा। इन्होंने खुद को साबित किया, तब इन पर भरोसा किया गया। इनका कहना है कि महिलाओं को मौका देकर देखिए, कोई भी काम असंभव नहीं है।
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ठान लिया था...
ट्रेनों में पहले पुरुष ही गार्ड हुआ करते थे, लेकिन मैंने ठान लिया था मुझे यह काम करके दिखाना है। मैं आगरा रेल मंडल की पहली महिला गार्ड बनी। रेलवे में चयन के बाद चंदौसी में ट्रेनिंग पर गई तो साथ के कर्मचारियों ने कहा कि लड़कियों के लिए यह जॉब ठीक नहीं है। ट्रेनिंग पूरी होने के बाद शुरुआत में कुछ असहज लगा मगर अब आदत हो गई है। कई बार रात में ट्रेन आउटर पर खड़ी होती है तो अपने केबिन को लॉक कर लेती हूं। - शिल्पी, गार्ड 
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ट्रेन चलाती हूं तो गर्व महसूस होता है  
पिता सुआलाल किसान है। उन्होंने कभी बेटा-बेटी में फर्क नहीं किया। हम दोनों बहनों को भी भाई के साथ पढ़ाया। पॉलीटेक्निक करने के बाद रेलवे में जब लोको पायलट की जॉब लगी तो परिचित लोगों ने कहा कि तुम टीचर बन जाओ। ट्रेन चलाना जिम्मेदारी का काम है। मगर मैंने अपने काम पर फोकस किया। अब पैसेंजर ट्रेन का संचालन करती हूं। पिता को यकीन था कि मैं ऐसा कर सकती हूं। मैं जब ट्रेन चलाती हूं तो मुझे खुद पर गर्व होता है। - मनीषा मीणा, सहायक लोको पायलट
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Aparajita 100 Million Smiles Success Story Of Women In Railways
अपराजिताः रेलवे और परिवहन विभाग में नौकरी करने वाली बेटियां - फोटो : अमर उजाला
बहनों से प्रेरित होकर बनी अफसर 
मेरी एक बहन आईएएस और दूसरी प्रोफेसर है। उनसे प्रेरित होकर मैंने ठान लिया कि कुछ करके दिखाना है। दिल्ली आईटीआई से बीटेक करने के बाद 2011 में संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण करके रेलवे में वरिष्ठ मंडल कार्मिक अधिकारी बनीं। पहली पोस्टिंग झांसी और दूसरी आगरा में हुई। यहां कर्मचारियों की भर्ती, वेतन निर्धारण, पदोन्नति, मृतक आश्रितों की नियुक्तियां, पेंशन जैसे काम हैं। काम नहीं होता तो लोग झल्लाते हैं, ऐसे में धैर्य से उनकी बात सुनती हूं। -मानसी, वरिष्ठ मंडल कार्मिक अधिकारी

बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के लिए बनी बस कंडक्टर 
शादी होने पर पढ़ाई बीच में ही छूट गई। पति की प्राइवेट नौकरी है। दो बच्चे होने के बाद उन्हें अच्छी शिक्षा देने के लिए खुद काम करने की ठानी। मैं इंटर तक पढ़ी थी। 2015 में परिचालक भर्ती की परीक्षा दी और पास होकर परिचालक बन गई। इस समय आईएसबीटी में तैनात हूं। ससुर ने कहा कि कहीं महिलाएं भी कंडक्टरी करती हैं। ससुर को मनाया कि घर को अच्छे से चलाने के लिए नौकरी करना जरूरी है। बस में कभी कोई कमेंट करता तो भी परवाह नहीं करती। -माधवश्री, बस परिचालक 

 शुरुआत में आईं मुश्किलें, अब सब आसान
पिता की मृत्यु के बाद परिवार की जिम्मेदारी मेरे पर आ गई। पिता रेलवे में थे। इंटर करने के बाद विभागीय परीक्षा दी तो पहले प्रयास में सफल रही। ट्रेनिंग के बाद आगरा कैंट पर ऑपरेटिंग विभाग में तैनाती मिल गई। पिता के रेलवे में होने के कारण लोगों ने बेटी की तरह ही सहयोग किया। मुश्किलें तो सभी के सामने आती हैं, लेकिन ऑपरेटिंग में जॉब बहुत चैलेंजिंग है। शुरुआत में लोगों से संवाद करने में झिझक महसूस होती थी, लेकिन अब यह जॉब का हिस्सा है। -भानुप्रिया, ऑपरेटिंग विभाग

 
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