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संक्रमण से जिनकी हालत हुई गंभीर, उनमें बनी सबसे ज्यादा एंटीबॉडी
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आगरा। दूसरी लहर में जिन लोगों की संक्रमण से हालत गंभीर रही, उनमें सबसे ज्यादा एंटीबॉडी पाई गई हैं। इनमें 250 यूनिट/एमएल तक एंटीबॉडी बनी। ऐसे मरीज, जिनमें कोई लक्षण नहीं था और दवाएं लेने की भी जरूरत नहीं पड़ी, उनमें एंटीबॉडी ही नहीं बनी हैं।
एसएन कॉलेज के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन की विभागाध्यक्ष डॉ. नीतू चौहान ने बताया कि दूसरी लहर में 872 मरीजों के ठीक होने के बाद एंटीबॉडी जांची गई। इनमें अप्रैल और मई में संक्रमित हुए लोगों की संख्या 90 फीसदी रही। जांच में 249 लोगों में 200 से 250 यूनिट/एमएल एंटीबॉडी पाई गई। ये लोग 20 से 60 साल की उम्र के रहे। इनकी केस हिस्ट्री से पता चला कि संक्रमण से इनकी हालत गंभीर हो गई थी, अस्पताल में औसतन 15 दिन तक रहना पड़ा। हाईफ्लो ऑक्सीजन भी लेनी पड़ी।
उन्होंने बताया कि 872 नमूूनों में से 10 नमूनों की जांच में बिल्कुल भी एंटीबॉडी नहीं बनी। इनकी उम्र 20 से 30 साल रही। इनसे पूछताछ में पाया कि इनको संक्रमण का कोई भी लक्षण प्रतीत नहीं हुआ और दवाएं भी नहीं लीं। मामूली सी खराश या फिर एक बार हल्का बुखार ही आया।
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110 में 50 से कम तो 255 में बनी 50 से 150 एंटीबॉडी
संक्रमण से ठीक होने के बाद 132 यूनिट/एमएल एंटीबॉडी मानक है। लेकिन 110 लोग ऐसे भी रहे, जिनमें 50 से कम एंटीबॉडी बनीं। यह मधुमेह, टीबी, सांस रोग, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग समेत अन्य बीमारियों से भी पीड़ित मिले। 51 से 131 यूनिट/एमएल एंटीबॉडी 170 लोगों में मिली। 343 लोगों में 132 से 200 यूनिट/एमएल एंटीबॉडी पाई गईं।
वायरस के लोड के सापेक्ष बनती हैं एंटीबॉडी: डॉ. अग्रवाल
एसएन कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. आरती अग्रवाल ने बताया कि शरीर के सेल संक्रमण के सापेक्ष रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते हैं। जिन लोगों की हालत गंभीर रही, उनमें वायरस का लोड काफी रहा और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी उसी के मुताबिक बनी। वायरस का लोड मामूली होने पर रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हुई। यही वजह रही कि उनमें एंटीबॉडी नहीं बनी या फिर मामूली बनीं।
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एसएन कॉलेज के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन की विभागाध्यक्ष डॉ. नीतू चौहान ने बताया कि दूसरी लहर में 872 मरीजों के ठीक होने के बाद एंटीबॉडी जांची गई। इनमें अप्रैल और मई में संक्रमित हुए लोगों की संख्या 90 फीसदी रही। जांच में 249 लोगों में 200 से 250 यूनिट/एमएल एंटीबॉडी पाई गई। ये लोग 20 से 60 साल की उम्र के रहे। इनकी केस हिस्ट्री से पता चला कि संक्रमण से इनकी हालत गंभीर हो गई थी, अस्पताल में औसतन 15 दिन तक रहना पड़ा। हाईफ्लो ऑक्सीजन भी लेनी पड़ी।
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उन्होंने बताया कि 872 नमूूनों में से 10 नमूनों की जांच में बिल्कुल भी एंटीबॉडी नहीं बनी। इनकी उम्र 20 से 30 साल रही। इनसे पूछताछ में पाया कि इनको संक्रमण का कोई भी लक्षण प्रतीत नहीं हुआ और दवाएं भी नहीं लीं। मामूली सी खराश या फिर एक बार हल्का बुखार ही आया।
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110 में 50 से कम तो 255 में बनी 50 से 150 एंटीबॉडी
संक्रमण से ठीक होने के बाद 132 यूनिट/एमएल एंटीबॉडी मानक है। लेकिन 110 लोग ऐसे भी रहे, जिनमें 50 से कम एंटीबॉडी बनीं। यह मधुमेह, टीबी, सांस रोग, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग समेत अन्य बीमारियों से भी पीड़ित मिले। 51 से 131 यूनिट/एमएल एंटीबॉडी 170 लोगों में मिली। 343 लोगों में 132 से 200 यूनिट/एमएल एंटीबॉडी पाई गईं।
वायरस के लोड के सापेक्ष बनती हैं एंटीबॉडी: डॉ. अग्रवाल
एसएन कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजिस्ट डॉ. आरती अग्रवाल ने बताया कि शरीर के सेल संक्रमण के सापेक्ष रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करते हैं। जिन लोगों की हालत गंभीर रही, उनमें वायरस का लोड काफी रहा और रोग प्रतिरोधक क्षमता भी उसी के मुताबिक बनी। वायरस का लोड मामूली होने पर रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित नहीं हुई। यही वजह रही कि उनमें एंटीबॉडी नहीं बनी या फिर मामूली बनीं।