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#हिंदीहैंहम: 'हिंदी सिर्फ भाषा नहीं, एकता की कड़ी है, जो देश को एक सूत्र में पिरोती है'
Sat, 22 Aug 2020 06:26 PM IST
मुकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा
Published by: मुकेश कुमार
Updated Sat, 22 Aug 2020 06:26 PM IST
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- फोटो : Amar Ujala
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किसी भी राष्ट्र की एकता के लिए उसकी एक भाषा का होना अनिवार्य माना गया है। भारत में यह भूमिका हिंदी निभा रही है। हिंदी न सिर्फ भाषा बल्कि देश की आत्मा की झंकार है। यह विविधताओं के बीच देश को एक सूत्र में पिरोती है। समाज के हर वर्ग को समता का अहसास भी कराती है। यह कहना है मथुरा के हिंदी भाषा विशेषज्ञों का।
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केआर डिग्री कॉलेज के हिंदी विभागाध्याक्ष रह चुके डॉ. रमाशंकर पांडेय का कहना है कि हिंदी भारत में संवाद की भाषा है। लगभग पूरा भारत में यह भाषा बोली या समझती जाती है। केवल हिंदी भाषी क्षेत्र ही नहीं, बल्कि अहिंदी भाषी प्रांतों में भी यह बोली और समझी जाती है। विभिन्न अहिंदी भाषी प्रांतों को भी यह संवाद का सेतु प्रदान करती है।
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हम कह सकते हैं कि हिंदी भारत में एकता की कड़ी है। किसी भी राष्ट्र की एकता के लिए उसकी एक भाषा का होना अनिवार्य माना गया है। भारत में यह भूमिका हिंदी निभा रही है। स्वाधीनता के बाद यह राजभाषा बनी यह इसकी उपयोगिता को प्रमाणित करता है। हिंदी भारत की आत्मा की झंकार है, इसमें हमारी सभ्यता और संस्कृति प्रतिबिंबित होती है।
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'हिंदी भारत की आन, बान और शान'
वृंदावन शोध संस्थान के ग्रंथागार प्रभारी डॉ. ब्रजभूषण चतुर्वेदी ‘दीपक’ हिंदी आज भारत की आन, बान और शान का गौरवशाली प्रतीक है। संसार में वैसे तो अनेक भाषाएं प्रचलित हैं, किंतु संस्कृत भाषा को समस्त भाषाओं की जननी कहा जाता है। संस्कृत से अनेक भाषाओं का जन्म हुआ। भारत की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने का गौरव हिंदी भाषा को मिला।
उन्होंने कहा कि हिंदी यथार्थ में इस गौरव की पात्र भी है। संस्कृत से पालि, प्राकृत और फिर कालांतर में शौरसेनी अपभ्रंश से इस भाषा का प्रादुर्भाव हुआ। अत्यंत समृद्ध भाषा होते हुए हिंदी उस सागर की भांति है, जिसमें न जाने कितनी नदियां आकर एकाकार हो जाती हैं। अनगिनत साहित्यकारों ने अपने युग में हिंदी में साहित्य सृजन कर इसे समृद्धि प्रदान की है।
उन्होंने कहा कि हिंदी यथार्थ में इस गौरव की पात्र भी है। संस्कृत से पालि, प्राकृत और फिर कालांतर में शौरसेनी अपभ्रंश से इस भाषा का प्रादुर्भाव हुआ। अत्यंत समृद्ध भाषा होते हुए हिंदी उस सागर की भांति है, जिसमें न जाने कितनी नदियां आकर एकाकार हो जाती हैं। अनगिनत साहित्यकारों ने अपने युग में हिंदी में साहित्य सृजन कर इसे समृद्धि प्रदान की है।