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शहीद क्रांतिकारियों की मूक गवाही दे रहा पुराना थाना
Updated Sun, 21 Jan 2018 11:51 PM IST
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बेवर। नौ अगस्त 1942 को बेवर में भारत छोड़ो आंदोलन में शहीद हुए क्रांतिकारियों की पुराना थाना और मुख्य द्वार याद दिलाता है। एक दिन के लिए बेवर को आजाद कराने वाले शहीद क्रांतिकारियों की याद में 17 दिवसीय शहीद मेला रामलीला मैदान में 23 जनवरी शुरू होता है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में जिले के क्रांतिकारी ही नहीं आम लोग भी आगे आए। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के साथ ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला। बेवर के क्रांतिकारियों ने 14 अगस्त 1942 को थाने को अंग्रेजी पुलिस से मुक्त कराकर एक दिन के लिए बेवर को आजाद करा लिया।
थाने पर मौजूद क्रांतिकारियों पर 15 अगस्त को अंग्रेज सैनिकों द्वारा की गई फायरिंग से एक छात्र सहित क्रांतिकारी शहीद हुए। बुजुर्ग सतीश चंद्र बताते हैं भारत छोड़ो आंदोलन ने हर किसी में देशभक्ति का जज्बा पैदा किया। देश की आजादी के लिए लोगों ने सड़कों पर आकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया।
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बेवर के लोग आजादी की लड़ाई में आगे आए। नौ अगस्त को शुरू हुआ आंदोलन बेवर में 14 अगस्त तक क्रांति में परिवर्तित हो गया। 14 अगस्त को बेवर थाने पर कब्जा कर तिरंगा फहराया गया। एक दिन के लिए बेवर अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराया। 15 अगस्त को अंग्रेजी पुलिस और सेना ने बेवर थाने पर मौजूद क्रांतिकारियों पर फायरिंग की।
छात्र कृष्ण कुमार, सीताराम गुप्ता, जमुना प्रसाद त्रिपाठी शहीद हुए। बेवर का जर्जर पुराना थाना भवन और शहीद स्मारक तीनों शहीदों की शहादत की मूक गवाही देते रहे हैं। शहीदों की याद में रामलीला मैदान में 23 जनवरी से शहीदों की याद में लगने वाले 17 दिवसीय मेल की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। मेला में शहीदों की याद में तमाम कार्यक्रम होते हैं।
पुराने थाने को बनाया जाए स्मारक
बेवर। देश की आजादी में बेवर का योगदान महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े स्मारक और स्थल उपेक्षा के शिकार हो चुके हैं। पुराना जर्जर थाना भवन शहीदों की आज भी याद दिलाता है।
नया थाना बनने के बाद उसकी देखभाल तक नहीं की जा रही। मेला प्रबंधक राज त्रिपाठी कहते हैं पुराने थाने को स्मारक के रूप में परिवर्तित किया जाना चाहिए।
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन में जिले के क्रांतिकारी ही नहीं आम लोग भी आगे आए। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने के साथ ही अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोला। बेवर के क्रांतिकारियों ने 14 अगस्त 1942 को थाने को अंग्रेजी पुलिस से मुक्त कराकर एक दिन के लिए बेवर को आजाद करा लिया।
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थाने पर मौजूद क्रांतिकारियों पर 15 अगस्त को अंग्रेज सैनिकों द्वारा की गई फायरिंग से एक छात्र सहित क्रांतिकारी शहीद हुए। बुजुर्ग सतीश चंद्र बताते हैं भारत छोड़ो आंदोलन ने हर किसी में देशभक्ति का जज्बा पैदा किया। देश की आजादी के लिए लोगों ने सड़कों पर आकर अंग्रेजी हुकूमत का विरोध किया।
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बेवर के लोग आजादी की लड़ाई में आगे आए। नौ अगस्त को शुरू हुआ आंदोलन बेवर में 14 अगस्त तक क्रांति में परिवर्तित हो गया। 14 अगस्त को बेवर थाने पर कब्जा कर तिरंगा फहराया गया। एक दिन के लिए बेवर अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराया। 15 अगस्त को अंग्रेजी पुलिस और सेना ने बेवर थाने पर मौजूद क्रांतिकारियों पर फायरिंग की।
छात्र कृष्ण कुमार, सीताराम गुप्ता, जमुना प्रसाद त्रिपाठी शहीद हुए। बेवर का जर्जर पुराना थाना भवन और शहीद स्मारक तीनों शहीदों की शहादत की मूक गवाही देते रहे हैं। शहीदों की याद में रामलीला मैदान में 23 जनवरी से शहीदों की याद में लगने वाले 17 दिवसीय मेल की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। मेला में शहीदों की याद में तमाम कार्यक्रम होते हैं।
पुराने थाने को बनाया जाए स्मारक
बेवर। देश की आजादी में बेवर का योगदान महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े स्मारक और स्थल उपेक्षा के शिकार हो चुके हैं। पुराना जर्जर थाना भवन शहीदों की आज भी याद दिलाता है।
नया थाना बनने के बाद उसकी देखभाल तक नहीं की जा रही। मेला प्रबंधक राज त्रिपाठी कहते हैं पुराने थाने को स्मारक के रूप में परिवर्तित किया जाना चाहिए।