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आरोपी भी समझौते को दे सकेगा प्रार्थना पत्र: जिला जज
Updated Mon, 25 Sep 2017 10:54 PM IST
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एटा। वादी के बाद अब आरोपी भी कोर्ट में सुलह समझौते के लिए प्रार्थना पत्र दे सकेगा। यह बात जिला जज ने दीवानी न्यायालय में आयोजित त्वरित विवाद समाधान, हर नागरिक का सहयोग कार्यक्रम में कही। साथ ही समझौते से निपटाए जाने वाले मामलों को भी बताया।
जिला जज ओपी अग्रवाल की अध्यक्षता में सोमवार को दीवानी न्यायालय परिसर में त्वरित समाधान कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें जिला जज ने कहा कि वादी पक्ष के बाद अब प्रतिवादी भी अपने मामले में सुलह समझौता होने के लिए न्यायालय में प्रार्थना पत्र दे सकता है। इसे विधिवत तरीके सेे न्यायाधीश, सरकारी वकील और वादी पक्ष के पास भेजा जाएगा। इसके बाद समिति के माध्यम से उस वाद पर विचार करते हुए दोनों तरफ से सुना जाएगा। जिला जज ने बताया कि इस दौरान समझौते से बात नहीं बनती है। तो फिर से उसी केस की सुनवाई पिछली कार्रवाई शुरु हो जाएगी। करीब 450 धाराएं गैर शमनीय शुल्क वाली है।
यदि इनमें बदलाव किया जा तो काफी हद तक मामले निपटाते हुए अदालतों पर वादों का बोझ हल्का किया जा सकता है। जिला जज ओपी अग्रवाल ने कहा कि ऐसे मामले जिनमें सात साल की कम सजा है। उनको तो लोक अदालत में समझौते से निपटाया जा सकता है। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट के वक्त पुलिस को ध्यान रखना चाहिए कि यदि मामला थाना स्तर पर निपटने योग्य है तो उसे निष्पक्ष और पीड़ित की भावनाओं को ध्यान रखते हुए निपटाया जाए। उन्होंने अधीनस्थों को बताया कि दीवानी जैसे मामलों को अधिकांश से अधिकांश समझौते या फिर शमनीय तरीके से निपटाया जाना चाहिए। जिला जज ने सक्षम अधिकारियों से अपील की कानून में बदलाव होना चाहिए। ताकि कानून का भलीभांति पालन हो सके।
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जिला जज ओपी अग्रवाल की अध्यक्षता में सोमवार को दीवानी न्यायालय परिसर में त्वरित समाधान कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें जिला जज ने कहा कि वादी पक्ष के बाद अब प्रतिवादी भी अपने मामले में सुलह समझौता होने के लिए न्यायालय में प्रार्थना पत्र दे सकता है। इसे विधिवत तरीके सेे न्यायाधीश, सरकारी वकील और वादी पक्ष के पास भेजा जाएगा। इसके बाद समिति के माध्यम से उस वाद पर विचार करते हुए दोनों तरफ से सुना जाएगा। जिला जज ने बताया कि इस दौरान समझौते से बात नहीं बनती है। तो फिर से उसी केस की सुनवाई पिछली कार्रवाई शुरु हो जाएगी। करीब 450 धाराएं गैर शमनीय शुल्क वाली है।
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यदि इनमें बदलाव किया जा तो काफी हद तक मामले निपटाते हुए अदालतों पर वादों का बोझ हल्का किया जा सकता है। जिला जज ओपी अग्रवाल ने कहा कि ऐसे मामले जिनमें सात साल की कम सजा है। उनको तो लोक अदालत में समझौते से निपटाया जा सकता है। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि प्रथम सूचना रिपोर्ट के वक्त पुलिस को ध्यान रखना चाहिए कि यदि मामला थाना स्तर पर निपटने योग्य है तो उसे निष्पक्ष और पीड़ित की भावनाओं को ध्यान रखते हुए निपटाया जाए। उन्होंने अधीनस्थों को बताया कि दीवानी जैसे मामलों को अधिकांश से अधिकांश समझौते या फिर शमनीय तरीके से निपटाया जाना चाहिए। जिला जज ने सक्षम अधिकारियों से अपील की कानून में बदलाव होना चाहिए। ताकि कानून का भलीभांति पालन हो सके।
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