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यूपी में 21 जिलों की धरती बीमार, जांच में हुए ऐसे खुलासे
पुनीत शर्मा, अमर उजाला मथुरा
Updated Tue, 09 Jan 2018 05:51 PM IST
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soil testing
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आगरा, मथुरा समेत प्रदेश के 21 जिलों की धरती गंभीर रूप से बीमार है। मिट्टी की जांच की जो रिपोर्ट आई है वह वाकई चौंकाने वाली है। सेहतमंद धरती में जीवाश्म का स्तर .75 होना चाहिए, लेकिन यह घटकर .4 तक रह गया है। नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम और जिंक की मात्रा भी बहुत कम हो गई है।
उत्तरप्रदेश में वर्ष 1960 के बाद से धरती की सेहत में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इस दौरान धरती में जीवाश्म का स्तर .7 से .8 तक था। उस वक्त एक किलो एनपीके खाद डालने से खेती में 18 फीसदी का इजाफा हो जाता था जो अब घटकर केवल छह फीसदी रह गया है।
खेतों से मिट्टी के 2 करोड़ 16 लाख सैंपल लेकर कराई गई जांच की रिपोर्ट तो और भी चौंकाने वाली है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जीवाश्म का स्तर .4 पर आ गया है। मिट्टी में जल धारण की क्षमता तेजी से कम हो रही है।
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किसान खेतों में कितना ही खाद डाल दें लेकिन पैदावार बढ़ने का नाम नहीं ले रही। यह चिंता का विषय है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश की धरती में जिंक और नाइट्रोजन सबसे कम पाई जा रही है। इससे धरती पर बंजर होने का खतरा बढ़ रहा है।
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उत्तरप्रदेश में वर्ष 1960 के बाद से धरती की सेहत में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। इस दौरान धरती में जीवाश्म का स्तर .7 से .8 तक था। उस वक्त एक किलो एनपीके खाद डालने से खेती में 18 फीसदी का इजाफा हो जाता था जो अब घटकर केवल छह फीसदी रह गया है।
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खेतों से मिट्टी के 2 करोड़ 16 लाख सैंपल लेकर कराई गई जांच की रिपोर्ट तो और भी चौंकाने वाली है। इस रिपोर्ट के मुताबिक जीवाश्म का स्तर .4 पर आ गया है। मिट्टी में जल धारण की क्षमता तेजी से कम हो रही है।
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किसान खेतों में कितना ही खाद डाल दें लेकिन पैदावार बढ़ने का नाम नहीं ले रही। यह चिंता का विषय है। पश्चिमी उत्तरप्रदेश की धरती में जिंक और नाइट्रोजन सबसे कम पाई जा रही है। इससे धरती पर बंजर होने का खतरा बढ़ रहा है।
इसलिए कम हो रहा जीवाश्म
कृषि अधिकारी डॉ. यतेंद्र कुमार का कहना है कि एक फसल के बाद दूसरी फसल की बुवाई से स्थिति बिगड़ रही है। खेत खाली कहां रह पा रहे हैं। क्योंकि पश्चिमी उत्तरप्रदेश में फसलें ज्यादा ली जाती हैं लिहाजा यहां जीवाश्म तेजी से कम हो रहा है।
जीवाश्म मतलब जीव का अंश (आर्गेनिक कार्बन) खेतों में पेड़ पौधे और पत्तियां जो गिरकर सड़ जाती हैं और मिट्टी का अंश बन जाती हैं उन्हें जीवाश्म कहा जाता है। पौधे जमीन से जीवाश्म कार्बन खींच तो रहे हैं लेकिन उतना जमीन को मिल नहीं पा रहा है।
अगर किसान पत्ती वाली फसल उगाकर या फिर खेत में फसलों का अंश सड़ाकर खेत में डालते हैं तो जीवाश्म बढ़ जाएगा। जीवाश्म की मात्रा बढ़ाने के लिए किसानों को गोबर की खाद और वर्मी कंपोस्ट का प्रयोग करना चाहिए।
जीवाश्म मतलब जीव का अंश (आर्गेनिक कार्बन) खेतों में पेड़ पौधे और पत्तियां जो गिरकर सड़ जाती हैं और मिट्टी का अंश बन जाती हैं उन्हें जीवाश्म कहा जाता है। पौधे जमीन से जीवाश्म कार्बन खींच तो रहे हैं लेकिन उतना जमीन को मिल नहीं पा रहा है।
अगर किसान पत्ती वाली फसल उगाकर या फिर खेत में फसलों का अंश सड़ाकर खेत में डालते हैं तो जीवाश्म बढ़ जाएगा। जीवाश्म की मात्रा बढ़ाने के लिए किसानों को गोबर की खाद और वर्मी कंपोस्ट का प्रयोग करना चाहिए।
इन जनपदों की ऐसी हालत
मथुरा, आगरा, एटा, मैनपुरी, कासगंज, अलीगढ़, बरेली, लखीमपुर खीरी, बदायूं, संभल, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा, बागपत, मेरठ, बड़ौत, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, गाजियाबाद और हापुड़।
प्रदेश में 2 करोड़ 16 लाख मिट्टी के सैंपल की हुई थी जांच
मथुरा जिले में ही 85 हजार के सैंपल लिए गए
34 फीसदी सैंपल में जीवाश्म का स्तर न्यूनतम .2 तक आया
प्रदेश में 2 करोड़ 16 लाख मिट्टी के सैंपल की हुई थी जांच
मथुरा जिले में ही 85 हजार के सैंपल लिए गए
34 फीसदी सैंपल में जीवाश्म का स्तर न्यूनतम .2 तक आया