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काली कलकते वाली की उपपीठ के रूप में हैं जयापीठ की मान्यता
Updated Wed, 23 Aug 2017 11:10 PM IST
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काली कलकत्ते वाली की उपपीठ के रूप में हैं जयापीठ की मान्यता
- फोटो : अमर उजाला
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सोरों(कासगंज)।
तीर्थनगरी में पौराणिक बटुकनाथ मंदिर श्रद्धालुओं की उपासना का प्रमुख केंद्र है। इस पौराणिक मंदिर में प्राचीन वट वृक्ष भी सूकर क्षेत्र की पावन भूमि का गौरव है। यह वट वृक्ष चार प्राचीन वट वृक्षों में एक गिना जाता है।
विश्वभर में चार वटवृक्ष प्राचीनतम हैं। यह चारों वट वृक्ष इस धरती पर प्रत्येक युग के प्रमाण रूप के साक्षी हैं। वराह पुराण के अनुसार ग्रद्ध वट सतयुग कालीन माना गया है। त्रेतायुगकालीन अक्षयवट इलाहाबाद में पाया जाता है। यह वाल्मीक रामायण में वर्णित है। द्वापरयुगीन वंशीवट वृंदावन में स्थित है। यह श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है। सिद्ध वट उज्जैन अवंतिका में स्थित है। गौरक्ष संवाद के अनुसार यह कलियुग का प्रमाण माना गया है।
बटुकनाथ मंदिर को काली कलकत्ते वाली की उपपीठ जयापीठ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि कलकत्ता में काली देवी की जात के लिए ना जा पाने वाले लोग अगर जयापीठ की जात कर लें तो उनकी जात पूरी मानी जाती है। आदि शंकराचार्य भी इस पीठ की जात करने आए थे। उनके द्वारा यहां स्थापित श्रीयंत्र मौजूद है। तांत्रिक इस श्रीयंत्र के सम्मुख अनुष्ठान कर तांत्रिक सिद्धियां हासिल करते हैं। वराह पुराण के 137 वें अध्याय में एक कथा में बताया गया है कि एक गिद्ध वाण से घायल होकर यहां गिरा था। जिसने मनुष्य योनि प्राप्त की। यह स्थान तमाम सिद्ध पुरुषों की साधना स्थली है। नवरात्रि के दिनों में यहां भव्य मेला आयोजित होता है। यहां बड़ी संख्या में आस पास के लोग बच्चों के मुंडन संस्कार को पहुंचते हैं। इस तीर्थ के दर्शन से जीव के पाप नष्ट होते हैं।
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तीर्थनगरी में पौराणिक बटुकनाथ मंदिर श्रद्धालुओं की उपासना का प्रमुख केंद्र है। इस पौराणिक मंदिर में प्राचीन वट वृक्ष भी सूकर क्षेत्र की पावन भूमि का गौरव है। यह वट वृक्ष चार प्राचीन वट वृक्षों में एक गिना जाता है।
विश्वभर में चार वटवृक्ष प्राचीनतम हैं। यह चारों वट वृक्ष इस धरती पर प्रत्येक युग के प्रमाण रूप के साक्षी हैं। वराह पुराण के अनुसार ग्रद्ध वट सतयुग कालीन माना गया है। त्रेतायुगकालीन अक्षयवट इलाहाबाद में पाया जाता है। यह वाल्मीक रामायण में वर्णित है। द्वापरयुगीन वंशीवट वृंदावन में स्थित है। यह श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित है। सिद्ध वट उज्जैन अवंतिका में स्थित है। गौरक्ष संवाद के अनुसार यह कलियुग का प्रमाण माना गया है।
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बटुकनाथ मंदिर को काली कलकत्ते वाली की उपपीठ जयापीठ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि कलकत्ता में काली देवी की जात के लिए ना जा पाने वाले लोग अगर जयापीठ की जात कर लें तो उनकी जात पूरी मानी जाती है। आदि शंकराचार्य भी इस पीठ की जात करने आए थे। उनके द्वारा यहां स्थापित श्रीयंत्र मौजूद है। तांत्रिक इस श्रीयंत्र के सम्मुख अनुष्ठान कर तांत्रिक सिद्धियां हासिल करते हैं। वराह पुराण के 137 वें अध्याय में एक कथा में बताया गया है कि एक गिद्ध वाण से घायल होकर यहां गिरा था। जिसने मनुष्य योनि प्राप्त की। यह स्थान तमाम सिद्ध पुरुषों की साधना स्थली है। नवरात्रि के दिनों में यहां भव्य मेला आयोजित होता है। यहां बड़ी संख्या में आस पास के लोग बच्चों के मुंडन संस्कार को पहुंचते हैं। इस तीर्थ के दर्शन से जीव के पाप नष्ट होते हैं।
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