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आए सावन की बहार पड़े बूंदन की फुहार
Updated Thu, 13 Jul 2017 11:44 PM IST
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झूला झूलती युवती
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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मैनपुरी। मौसम के मिजाज बदलने के साथ तीज-त्योहार भी गुम होते जा रहे हैं। सावन को ही लें अब पहले की तरह बारिश नहीं होती। वहीं आधुनिकीकरण ने भी बदलते सामाजिक ताने-बाने में परंपराओं पर ग्रहण लगाने का काम किया है। सावन में अब शहर तो दूर गांवों तक में पहले की तरह मल्हार और कजरी के गीत सुनने को नहीं मिलते। टीवी, मोबाइल और डीवीडी ने भारतीय संस्कृति को कहीं गुम सा कर दिया है। बुजुर्ग महिलाओं तक ही अब सावन के दौरान गाई जाने वाली कजरी और मल्हार सिमट कर रह गए हैं।
सावन में रिमझिम फुहारों के बीच मिट्टी की सौंधी खुशबू का स्थान एसी और रूम फ्रैशनर ने ले लिया है। भीषण गर्मी के बाद सावन शुरू होते ही वातावरण में आने वाली नमी और ठंडक खो चली है। वहीं सावन आते ही गाए जाने वाली झुलुआ तरे मारो पिपर तरे गाड़ो जम रही हरी-हरी दूब रे, वीर आए चीर लाए सासू ननद मुख मोड़ियो, महिला ढूंढे दुमहिला ढूंढे बहन कहूं नहीं पाएगी जैसी मल्हारें अब गुजरे जमाने की बात हो गई हैं। नई पीढ़ी तो इनके अर्थ भी नहीं निकाल पाएगी। सावन आता है और कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। पुरानी परंपराएं और परंपरागत गीत नए जमाने के शोरगुल में दबकर रह गए हैं।
स्टेशन रोड निवासी महिला विमला दुबे कहती हैं कि अब सावन में मल्हारें और कजरी गाने के जमाने लद गए हैं। गाओ भी तो नई पीढ़ी उसे समझती तक नहीं है। वह बताती हैं कि उनके जमाने में चूड़ो तो आयो हाथी दांत को बीकानेर से जी, हरो जंगाली चूड़ो न पहनू, हरी महाराज की पाग जी जैसी मल्हारें गांव-गांव गूंजती थीं।
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पंजाबी कालोनी निवासी महिला प्रकाश कालरा ने बताया कि सावन में मल्हार और कजरी का अलग ही मजा था। झूला झूलने के दौरान महिलाएं और युवतियां तेज स्वर में जब मल्हार छेड़ती थीं तो पुरुष भी सुनने से अपने को रोक नहीं पाते थे। आए सावन की बहार पड़े बूंदन की फुहार पपीहा बोले पीहू-पीहू, मोर पपीहा डाली-डाली न आए सावन की फुहार जैसे सावन के गीत अब सुनने को नहीं मिलते।
झूले भी नहीं देते दिखाई
पहले सावन आते ही शहरों में घरों के आंगन और गांवों में पेड़ों पर जगह-जगह झूले डाले जाते थे। लेकिन आधुनिकता में यह सब खो से गए हैं। अब युवक युवतियां जहां मोबाइल पर चेटिंग में मस्त रहते हैं वहीं महिलाएं टीवी शो देखने में समय गुजारती हैं।
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सावन में रिमझिम फुहारों के बीच मिट्टी की सौंधी खुशबू का स्थान एसी और रूम फ्रैशनर ने ले लिया है। भीषण गर्मी के बाद सावन शुरू होते ही वातावरण में आने वाली नमी और ठंडक खो चली है। वहीं सावन आते ही गाए जाने वाली झुलुआ तरे मारो पिपर तरे गाड़ो जम रही हरी-हरी दूब रे, वीर आए चीर लाए सासू ननद मुख मोड़ियो, महिला ढूंढे दुमहिला ढूंढे बहन कहूं नहीं पाएगी जैसी मल्हारें अब गुजरे जमाने की बात हो गई हैं। नई पीढ़ी तो इनके अर्थ भी नहीं निकाल पाएगी। सावन आता है और कब बीत जाता है पता ही नहीं चलता। पुरानी परंपराएं और परंपरागत गीत नए जमाने के शोरगुल में दबकर रह गए हैं।
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स्टेशन रोड निवासी महिला विमला दुबे कहती हैं कि अब सावन में मल्हारें और कजरी गाने के जमाने लद गए हैं। गाओ भी तो नई पीढ़ी उसे समझती तक नहीं है। वह बताती हैं कि उनके जमाने में चूड़ो तो आयो हाथी दांत को बीकानेर से जी, हरो जंगाली चूड़ो न पहनू, हरी महाराज की पाग जी जैसी मल्हारें गांव-गांव गूंजती थीं।
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पंजाबी कालोनी निवासी महिला प्रकाश कालरा ने बताया कि सावन में मल्हार और कजरी का अलग ही मजा था। झूला झूलने के दौरान महिलाएं और युवतियां तेज स्वर में जब मल्हार छेड़ती थीं तो पुरुष भी सुनने से अपने को रोक नहीं पाते थे। आए सावन की बहार पड़े बूंदन की फुहार पपीहा बोले पीहू-पीहू, मोर पपीहा डाली-डाली न आए सावन की फुहार जैसे सावन के गीत अब सुनने को नहीं मिलते।
झूले भी नहीं देते दिखाई
पहले सावन आते ही शहरों में घरों के आंगन और गांवों में पेड़ों पर जगह-जगह झूले डाले जाते थे। लेकिन आधुनिकता में यह सब खो से गए हैं। अब युवक युवतियां जहां मोबाइल पर चेटिंग में मस्त रहते हैं वहीं महिलाएं टीवी शो देखने में समय गुजारती हैं।