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अटल टनल से दो किमी पीछे खेतों में ही बिक गया आलू, पढ़ें वजह

Fri, 02 Oct 2020 10:42 PM IST
Krishan Singh सुरेश शांडिल्य, अमर उजाला, कुठविहार (लाहौल-स्पीति)
सुरेश शांडिल्य, अमर उजाला, कुठविहार (लाहौल-स्पीति) Published by: Krishan Singh Updated Fri, 02 Oct 2020 10:42 PM IST
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Two kilometers away from the Atal Tunnel rohtang, the potato was sold in fields.
लाहौल आलू की फसल निकालते किसान - फोटो : अमर उजाला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आगमन और अटल टनल के लोकार्पण की तैयारियां चल रही हैं। साथ ही कार्यक्रम स्थल से दो किलोमीटर पीछे कुठविहार में शुक्रवार को किसान रमेश और उनकी पत्नी शांति आलू की फसल निकालने में व्यस्त रहे। अटल सुरंग के नॉर्थ पोर्टल पर शुक्रवार को राजनाथ सिंह जायजा लेने आए। ऐसे में नाका लगाया गया था। गाड़ियों को यहीं रोक दिया गया। ऐसे में गाड़ियों में सवार कुछ लोगों ने उनसे खेत में ही मोलभाव कर आलू खरीदे। 50 किलो की बोरी 1300 से 1500 रुपये  तक बिक रही है। यह ऐसी जगह है, जहां मई से लेकर अक्तूबर महीने तक ही खेती होती है। उसके बाद यहां बर्फ ही बर्फ होती है और ऊपर पहाड़ से हिमखंड गिरते हैं।

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ऐसे में यहां मकान भी गुफानुमा ही बनाए गए हैं। यह एक मंजिल के कंक्रीट के अस्थायी मकान हैं। रमेश और शांति की तरह ही कई अन्य किसान भी यहां अस्थायी रूप से रहते हैं। छह महीने के बाद रोहतांग पूरी से बंद हो जाता है तो इन्हें अक्तूबर में ही लौटना होता है। फिर छह महीने तक मनाली में ही रहना होता है। लाहौल के इस क्षेत्र के अलावा इनका मनाली में भी अपना मकान है। रमेश और शांति खेत से थोड़ा सा आगे गौतम कुमार का खेत है। गौतम कुमार ने भी यहां एक मंजिल का कंक्रीट का अस्थायी मकान बनाया हुआ है। उन्होंने कहा कि उन्होंने साथ में जो आलू की बोरियां भर रखी हैं। यह हाथोंहाथ यहीं बिक गई हैं। लाहौल के आलू की वैसे भी देश और दुनिया में मांग रहती है। कुछ खरीदार तो इसी नाके में हैं। एक पुलिस अधिकारी भी उनसे आलू खरीद कर ले गया है।
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मुख्यधारा से जुड़ेगा क्षेत्र
रमेश और शांति ने बताया कि अटल टनल के बनने से यह क्षेत्र मुख्यधारा में आ जाएगा। वह छह महीने के लिए पूरी तरह से अपनी जन्मभूमि से कट जाते थे। अब ऐसा नहीं होगा। जब भी चाहेंगे, घर आ जाएंगे। गौतम कुमार ने कहा कि यह बहुत बड़ा काम हो रहा है। इससे आलू, मटर या गोभी के परिवहन की लागत घट जाएगी और छह महीने से अधिक समय अपने खेतों को दे पाएंगे। इससे व्यापारी भी रोहतांग दर्रा के बजाय मनाली से थोड़े से ही वक्त में पहुंच जाएंगे, उधर से आधा दिन लग जाता है। सड़क भी ठीक नहीं है।  

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