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Shimla News: शहर के भवनों की भूकंपीय क्षमता का होगा वैज्ञानिक अध्ययन

Wed, 25 Feb 2026 11:59 PM IST
Shimla Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Wed, 25 Feb 2026 11:59 PM IST
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There will be a scientific study of the seismic capacity of the city's buildings.
एचपीयू की टीम ड्रोन से सर्वेक्षण कर जुटाएगी भवनों के आंकड़े और भूकंप झेलनी की क्षमता का करेगी अध्ययन
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एआई तकनीक का भी किया जाएगा इस्तेमाल
भूकंप से बचाव के लिए टिप्स भी देगी विवि की टीम
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) राजधानी शिमला के आवासीय और व्यावसायिक भवनों की भूकंपीय संवेदनशीलता तथा संरचनात्मक क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन करेगा। इसमें यह जांचा जाएगा कि भवन भूकंप को झेलने की कितनी क्षमता रखते हैं तथा भूकंप से बचाव के लिए शहर में क्या-क्या कदम उठाने चाहिए।

यह शोध विश्वविद्यालय के आपदा प्रबंधन अध्ययन केंद्र के माध्यम से संचालित होगा। इसमें ड्रोन आधारित सर्वेक्षण, भू-स्थानिक मानचित्रण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण शामिल रहेगा।
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शिमला भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में शामिल है। ऐसे में भवनों की वास्तविक स्थिति, निर्माण शैली, ऊंचाई, घनत्व और ढलान पर बसे आवासीय समूहों का सटीक आकलन आवश्यक माना जा रहा है। प्रस्तावित अध्ययन में ड्रोन के माध्यम से शहर के विभिन्न हिस्सों की उच्च-रेजोल्यूशन इमेजिंग की जाएगी और भवनों की गणना तथा वर्गीकरण होगा। एकत्रित आंकड़ों को एआई आधारित मॉडल से जोड़कर संभावित क्षति, जोखिम स्तर और प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की जाएगी। विश्वविद्यालय ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण को लेकर अनुसंधान गतिविधियों को तेज किया है। इसी क्रम में नॉर्वेजियन भू-तकनीकी संस्थान के साथ समझौता ज्ञापन भी किया है। समझौते के मुताबिक ढलान स्थिरता, भूस्खलन जोखिम और भूकंपीय प्रभावों पर संयुक्त अध्ययन की रूपरेखा तैयार की जा रही है। यह सहयोग हिमालयी क्षेत्रों के लिए उन्नत तकनीकी पद्धतियों के उपयोग को बढ़ावा देगा। विश्वविद्यालय स्तर पर एआई आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करने की दिशा में भी कार्य हो रहा है, जो भूकंप सहित अन्य प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम आकलन में सहायक हो सकती है।
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नीतियां बनाने में सहायक होगा शोध : डॉ. मनीश
विश्वविद्यालय के आपदा प्रबंधन अध्ययन केंद्र के डॉ. मनीश शर्मा ने बताया कि इस अध्ययन से नगर नियोजन, भवन निर्माण मानकों और आपदा प्रबंधन रणनीतियों को वैज्ञानिक आधार मिलेगा। शोध के निष्कर्ष, प्रशासन और स्थानीय निकायों के लिए नीतिगत निर्णयों में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। इससे भविष्य में संभावित भूकंप जोखिम को कम करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।
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