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Shimla News: हजारों कर्मचारियों का टीडीएस अटका 100 अफसरों, उद्योगपतियों को नोटिस
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एक्सकलूसिव
विभागों, संस्थानों और उद्योग से जुड़े प्रमुखों ने कर्मचारियों का टीडीएस काटकर आयकर विभाग के पास नहीं किया जमा
70 सरकारी और 30 निजी संस्थान डिफॉल्टर
21 करोड़ की रिकवरी का जारी किया है नोटिस
दीपक मेहता
शिमला। हजारों कर्मचारियों के वेतन से काटा गया टीडीएस (टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स) सरकारी खाते में जमा न करवाने पर आयकर विभाग ने कार्रवाई शुरू कर दी है। शिमला जोन के करीब 100 सरकारी और निजी संस्थानों को नोटिस जारी किए हैं। इसमें बैंक, शैक्षणिक और आईटी संस्थान तथा उद्योगपति शामिल हैं। उन्होंने सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों से टैक्स तो काटा लेकिन उसे सरकार के खाते में जमा नहीं करवाया।
आयकर विभाग के मुताबिक इन संस्थानों से करीब 21 करोड़ रुपये की वसूली की जानी है। पहले नोटिस के बावजूद भुगतान न करने पर अब रिकवरी जारी कर वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सभी डिफॉल्टरों को 31 मार्च 2026 तक लंबित बकाया टीडीएस जमा करवाने के निर्देश दिए हैं। तय समय में भुगतान न होने पर बैंक खाते सीज करने और जुर्माने सहित कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक कई संस्थान और निजी फर्में रिटर्न फाइन नहीं कर रहीं। कई संस्थान कर्मचारियों से टैक्स तो काटते हैं, लेकिन उसे सरकारी खाते में जमा नहीं करते या गलत कोड और पैन-टैन मिसमैच के कारण भुगतान रिकॉर्ड में नहीं दिखता। इससे संबंधित संस्था डिफाल्टर की श्रेणी में आ जाती हैं। आयकर अधिकारी (टीडीएस) विपिन पाल खुराना ने बताया कि विभाग इन मामलों की लगातार निगरानी कर रहा है और सभी डिफॉल्टरों को दोबारा नोटिस भेजे जा रहे हैं। संवाद
लापरवाही और फंड की कमी बनी वजह
इनकम टैक्स विभाग के मुताबिक जिला शिमला, किन्नौर, स्पीति, कुल्लू के करीब 2,500 नियोक्ताओं में से 70 सरकारी और 30 निजी संस्थानों टीडीएस में डिफाल्टर पाए गए हैं। इनमें से कई वर्ष 2012–13 से टीडीएस रिटर्न फाइल नहीं कर रहे हैं। सबसे ज्यादा टीडीएस लोक निर्माण विभाग, बैंक, एसडीएम व खंड कार्यालय, राजस्व, शिक्षा सहित उद्योग से जुड़ी अन्य निजी फर्मों से वसूला जाना है। प्रशासनिक लापरवाही और फंड की कमी को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
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क्या है टीडीएस
टीडीएस वह कर है जो किसी व्यक्ति के वेतन, किराया, ब्याज या कमीशन आदि से भुगतान से पहले काट लिया जाता है। नियोक्ता या संस्था यह राशि सरकार के खाते में जमा करवाने के लिए जिम्मेदार होती हैं। यह भुगतान प्राप्तकर्ता के पैन नंबर से लिंक होकर आयकर रिकॉर्ड में दर्ज होता है।
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विभागों, संस्थानों और उद्योग से जुड़े प्रमुखों ने कर्मचारियों का टीडीएस काटकर आयकर विभाग के पास नहीं किया जमा
70 सरकारी और 30 निजी संस्थान डिफॉल्टर
21 करोड़ की रिकवरी का जारी किया है नोटिस
दीपक मेहता
शिमला। हजारों कर्मचारियों के वेतन से काटा गया टीडीएस (टैक्स डिडक्टेड एट सोर्स) सरकारी खाते में जमा न करवाने पर आयकर विभाग ने कार्रवाई शुरू कर दी है। शिमला जोन के करीब 100 सरकारी और निजी संस्थानों को नोटिस जारी किए हैं। इसमें बैंक, शैक्षणिक और आईटी संस्थान तथा उद्योगपति शामिल हैं। उन्होंने सरकारी और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों से टैक्स तो काटा लेकिन उसे सरकार के खाते में जमा नहीं करवाया।
आयकर विभाग के मुताबिक इन संस्थानों से करीब 21 करोड़ रुपये की वसूली की जानी है। पहले नोटिस के बावजूद भुगतान न करने पर अब रिकवरी जारी कर वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी है। सभी डिफॉल्टरों को 31 मार्च 2026 तक लंबित बकाया टीडीएस जमा करवाने के निर्देश दिए हैं। तय समय में भुगतान न होने पर बैंक खाते सीज करने और जुर्माने सहित कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी। विभागीय अधिकारियों के मुताबिक कई संस्थान और निजी फर्में रिटर्न फाइन नहीं कर रहीं। कई संस्थान कर्मचारियों से टैक्स तो काटते हैं, लेकिन उसे सरकारी खाते में जमा नहीं करते या गलत कोड और पैन-टैन मिसमैच के कारण भुगतान रिकॉर्ड में नहीं दिखता। इससे संबंधित संस्था डिफाल्टर की श्रेणी में आ जाती हैं। आयकर अधिकारी (टीडीएस) विपिन पाल खुराना ने बताया कि विभाग इन मामलों की लगातार निगरानी कर रहा है और सभी डिफॉल्टरों को दोबारा नोटिस भेजे जा रहे हैं। संवाद
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लापरवाही और फंड की कमी बनी वजह
इनकम टैक्स विभाग के मुताबिक जिला शिमला, किन्नौर, स्पीति, कुल्लू के करीब 2,500 नियोक्ताओं में से 70 सरकारी और 30 निजी संस्थानों टीडीएस में डिफाल्टर पाए गए हैं। इनमें से कई वर्ष 2012–13 से टीडीएस रिटर्न फाइल नहीं कर रहे हैं। सबसे ज्यादा टीडीएस लोक निर्माण विभाग, बैंक, एसडीएम व खंड कार्यालय, राजस्व, शिक्षा सहित उद्योग से जुड़ी अन्य निजी फर्मों से वसूला जाना है। प्रशासनिक लापरवाही और फंड की कमी को प्रमुख कारण माना जा रहा है।
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क्या है टीडीएस
टीडीएस वह कर है जो किसी व्यक्ति के वेतन, किराया, ब्याज या कमीशन आदि से भुगतान से पहले काट लिया जाता है। नियोक्ता या संस्था यह राशि सरकार के खाते में जमा करवाने के लिए जिम्मेदार होती हैं। यह भुगतान प्राप्तकर्ता के पैन नंबर से लिंक होकर आयकर रिकॉर्ड में दर्ज होता है।