हिमाचल की स्मार्ट सिटी पर गहराने लगा संकट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हिमाचल की इकलौता स्मार्ट सिटी पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। हाईकोर्ट की ओर से धर्मशाला स्मार्ट सिटी की अधिसूचना रद्द करने के बाद खींचतान और तेज हो गई है। इस खींचतान से प्रदेश को मिली एकमात्र स्मार्ट सिटी के भी हाथ से जाने की नौबत आ गई है। केंद्र सरकार ने अब राज्यों से स्मार्ट सिटी के लिए आवेदन लेना बंद कर दिया है।
15 अगस्त तक केंद्र के पास 85 स्मार्ट सिटी के प्रस्ताव आए थे। इसके बाद जो भी प्रस्ताव आए थे, उन्हें रद्द कर दिया गया। यदि स्मार्ट सिटी चयन समिति अब शिमला का प्रस्ताव नए सिरे से केंद्र सरकार को भेजती है तो एक और संकट खड़ा हो सकता है। चूंकि, केंद्र से प्रदेश सरकार को धर्मशाला स्मार्ट सिटी में शामिल किए का पत्र मिल चुका है।
सरकार ने कहा फिर रखेंगे प्रस्ताव
वर्ष 2016 से प्रोजेक्ट के लिए फंडिंग होनी शुरू होनी है। अब इस पर भी संशय गहरा गया है। प्रदेश सरकार की मानें तो केंद्र सरकार ने अपनी गाइडलाइन में स्पष्ट किया है कि स्मार्ट सिटी के लिए कोई नया आवेदन नहीं लिया जाएगा। हालांकि, हाईकोर्ट के आदेशों का हवाला देकर प्रदेश सरकार अब गेंद केंद्र के पाले में डालने के प्रयास में है।
उधर, यह भी तर्क दिया जा रहा है कि शिमला शहर को स्मार्ट सिटी में लाने का प्रस्ताव भेजने से पहले अमृत योजना को सरेंडर करना होगा। ऐसे में दोनों योजनाओं से भी हाथ धोना पड़ सकता है।
आंकड़ों के साथ नहीं होगी छेड़छाड़
शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा का कहना है कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट को लेकर आंकड़ों से कोई छेड़छाड़ नहीं होगी। नए सिरे से स्मार्ट सिटी का चयन होगा। इसमें शिमला का प्रस्ताव भी केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट के आदेशों की प्रोसीडिंग सरकार को नहीं मिली है। जहां तक सूचना है सरकार को दो सप्ताह के भीतर हाईकोर्ट में अपना पक्ष रखना है। सरकार स्मार्ट सिटी को लेकर अपना पक्ष रखेगी।
स्मार्ट सिटी के झगड़े में फंस सकता है अमृत प्रोजेक्ट
वहीं, प्रदेश में स्मार्ट सिटी को लेकर झगड़े के बीच अमृत प्रोजेक्ट फंस सकता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि अगर निगम शिमला को स्मार्ट सिटी का प्रोजेक्ट केंद्र को भेजना है तो नगर निगम को पहले अमृत प्रोजेक्ट को सरेंडर करना पड़ेगा। शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा ने कहा कि प्रदेश सरकार नए सिरे से स्मार्ट सिटी का प्रोजेक्ट केंद्र सरकार को भेजेगी।
इसमें शिमला का नाम भी भेजा जाएगा, लेकिन इससे पहले शिमला को अमृत योजना से बाहर होना पड़ेगा। वहीं, नगर निगम शिमला के मेयर संजय चौहान ने कहा कि शहरी विकास मंत्री पहले केंद्र की गाइडलाइन को गंभीरता से पढ़ें। राज्यों में कई ऐसे शहर हैं, जो अमृत और स्मार्ट सिटी दोनों हैं। ऐसे में शिमला को अमृत योजना से बाहर नहीं किया जा सकता।
कहा कि जहां तक शहरी विकास मंत्री पैसा खर्च न करने की बात कर रहे हैं, वह पैसा भाजपा और कांग्रेस कार्यकाल के दौरान लैप्स हुआ है। माकपा इसके बाद नगर निगम में आई है। आरोप लगाया कि नगर निगम की सत्ता जब से संभाली है, सरकार ने नगर निगम को एक रुपया तक नहीं दिया। अमृत योजना में नगर निगम को 25 लाख की पहली किस्त जारी हुई है।
यह पैसा भी अभी तक सरकार ने अपने पास रखा है। केंद्र की गाइडलाइन के अनुसार 7 दिन में यह पैसा नगर निगम को मिलना चाहिए था। कहा कि जिस वक्त स्मार्ट सिटी को लेकर हाई पावर कमेटी की बैठक हुई थी, उसमें नगर निगम के अधिकारी को नहीं बुलाया गया। उधर, शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा ने कहा कि विकास कार्य के आधार पर यूएलबी को नंबर मिले हैं।
नगर निगम में चाहे कांग्रेस या बीजेपी रही हो, लेकिन पैसे का उपयोग करना नगर निगम की जिम्मेवारी है। विकास कार्यों का पैसा लैप्स होने पर ही शिमला स्मार्ट सिटी से पिछड़ा था। केंद्र से शहरी निकायों के लिए जो भी प्रोजेक्ट आते हैं, उसमें राज्य सरकार और निकाय का भी शेयर रहता है। सरकार ने अपना शेयर दिया है।