धर्मशाला के धर्मसंकट के लिए ईश्वर से प्रार्थना कीजिए
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
धर्मशाला में होने वाले क्रिकेट मैच को लेकर हिमाचल अजब धर्मसंकट में है। पूरी दुनिया की निगाहें हिमाचल प्रदेश पर टिकी हैं। उसकी छवि असहिष्णु राज्य की बन गई है। जैसे यहां मैच गोया खिलाड़ियों के साथ नहीं बल्कि आतंकवादियों के साथ होना है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के दिल में शहीद परिवारों को लेकर चाहे जितनी पीड़ा दिख रही हो लेकिन मैच को लेकर उनका राजनीतिक स्टैंड किसी से छुप नहीं पा रहा है।
धर्मशाला में मैच टलने की आशंका से अनुराग ठाकुर का दिल बादल की तरह फट रहा है। जिस स्टेडियम ने उन्हें नई पहचान दी, वही उनके राजनीतिक कैरियर की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। सारे विरोधी शहीद परिवारों के बीच उनकी छवि एक खलनायक की बनाकर पेश कर रहे हैं। राजनीति हर कामयाबी की कीमत मांगती है और इसे इनकम टैक्स की तरह चुकाना ही पड़ता है।
लेकिन जिद की इन दो ध्रुवों के बीच एक हिमाचल है जो यहां के नागरिकों से बना है। वो क्या चाहता है? मैच हो या न हो। क्योंकि जो हिमाचल में रहते हैं, वो समझ रहे हैं कि यहां पहले दिन से कैसी ओछी राजनीति हो रही है। भाजपा चाहती है, मैच न हो ताकि हिमाचल में रह रहे हजारों हजार सैनिक परिवारों का वोट बैंक उससे नाराज न हो जाए। कांग्रेस चाहती है कि वह कम से कम मैच के विरोध में दिखे।
अनुराग चाहते हैं कि मैच हो क्योंकि टी-20 के सबसे रोमांचक मैच को वह अपने स्टेडियम तक लाए। वह पहाड़ों के बीच बने अपने शानदार स्टेडियम को दुनिया भर के टीची चैनलों पर छाया हुआ देखना चाहते हैं। मेजर मनकोटिया के लिए ये मैच संजीवनी बूटी है और प्रेम कुमार धूमल के लिए राजनीति की चौसर। मैच नहीं होता है तो उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी का कद छोटा हो जाएगा। अगर होगा तो बेटे का कद धौलाधार की पहाड़ियों को छूएगा। इसीलिए उन्होंने अजब सी खामोशी ओढ़ ली है। और सरकार मझधार में है।
जब शहीदों ने ही उठाए सवाल
उसने ऐसे भस्मासुर को जन्म दे दिया है जो उन्हीं के पीछे दौड़ रहा है। इसे बोलचाल की भाषा में आप गले की हड्डी भी कह सकते हैं। इस विवाद के जन्मदाता शांता कुमार की शांति भी ऐसे संकेत दे रही है। हिमाचल के लोग क्या चाहते हैं, इसकी सबसे खूबसूरत अभिव्यक्ति शहीद अंकित के पिता की तरफ से आई। अंकित पिछले साल 26 मई 2015 को श्रीनगर में आतंकी हमले में शहीद हुआ था।
अंकित के पिता सत्य प्रकाश प्रधान ने कहा- कोई बताए शहीदों के बीच ये क्रिकेट मैच कहां से आ गया? अब वे शहीदों के घर पर आकर सिर्फ यही पूछ रहे हैं कि भारत-पाक मैच होना चाहिए या नहीं। आखिर शहीदों के परिवारों को मैच से क्या लेना-देना। खिलाड़ी कोई आतंकवादी नहीं। फिर उनका विरोध क्यों? उन्होंने गुस्से से कहा कि शहीद जवानों के परिवार किस हालत में जी रहे हैं, यह इन नेताओं ने कभी जानने की कोशिश नहीं की।
शहादत का असल दर्द सह रहा एक बाप सही कह रहा है। पाकिस्तान का विरोध करना है तो उसके साथ सभी रिश्ते खत्म कर दो। केवल मैच का विरोध क्यों? बंद ही करना है तो पाकिस्तान से भारत आने वाले वालों का वीजा बंद करो। पाकिस्तान के साथ भारत का व्यापार ही बंद करो। वह पानी बंद कर दो जो हिमाचल पाकिस्तान को दे रहा है। भारत-पाक मैच को ही इतना क्यों उछाला जा रहा है।
असम में भी पाकिस्तानी खिलाड़ी खेले, उनका विरोध क्यों नहीं किया। भारत-पाक मैच वर्ल्ड कप का आयोजन है। इसका विरोध नहीं होना चाहिए। इससे धर्मशाला पर भी दाग लग जाएगा। दाग सिर्फ धर्मशाला पर नहीं लगेगा। पूरे हिमाचल पर लगेगा।
मिल्खा सिंह की कहानी है गवाह
पूरी दुनिया में खेल होते हैं। एक देश के खिलाड़ी दूसरे देश में खेलने जाते हैं। उनका सत्कार होता है। क्योंकि एक खिलाड़ी ही हैं जो दो मुल्कों की तमाम नफरतों के बीच अमन और शांति का पैगाम देते हैं। मिल्खा सिंह की कहानी इसकी गवाह है। 1960 में पाकिस्तान के लाहौर शहर में दौड़ने के लिए आए निमंत्रण को उन्होंने ठुकरा दिया था क्योंकि वह 1947 में दोनों देशों के बीच हुए बंटवारे की दुखद यादों को भुला नहीं पा रहे थे।
उस समय लाशों से भरी ट्रेनों के नजारे उनकी आंखों के सामने छा गए। ये खबर अखबारों की सुर्खियां बनीं। अगले दिन नेहरू ने उन्हें समझाया। सारी पुरानी बातें भूलकर लाहौर जाओ। आज से तुम्हारे मां-बाप भारत और पाकिस्तान हैं। और देश के लिए वह सिरफिरा सरदार खुली जीप में लाहौर गया। 15 किलोमीटर तक सड़क के दोनों तरफ खड़ी भीड़ ने हाथों में भारत और पाकिस्तान के झंडे लहराकर उनका स्वागत किया। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल मोहम्मद अयूब खान ने उन्हें उड़न सिख (फ्लाइंग सिख) की पदवी से नवाजा।
तो एक ये राजनीतिक किरदार था। और आज क्या हो रहा है। याद कीजिए पाकिस्तान में 2009 में श्रीलंकाई टीम पर आतंकवादी हमला हुआ था। टेस्ट मैच खेलने जा रही श्रीलंकाई टीम की बस को लाहौर में आतंकवादियों ने घेर लिया। बस पर कई राउंड फायरिंग की गई। हमले में श्रीलंकाई टीम के कुछ सदस्य घायल भी हुए लेकिन बस ड्राइवर की सूझ बूझ के चलते खिलाड़ी किसी तरह गद्दाफी स्टेडियम पहुंचे।
वहां से उन्हें हेलीकाप्टर के जरिए सुरक्षित जगह पर ले जाया गया। एक वो दिन था और आज का दिन है। इस हमले के बाद पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय स्तर का कोई मैच नहीं खेला जाता। वर्ल्ड कप की मेजबानी भी पाकिस्तान से छिन गई। आज हर पाकिस्तानी नागरिक इस घटना से शर्मिंदा है। हमें पूरा भरोसा है कि हिमाचल में कोई पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर फायरिंग नहीं करेगा। लेकिन किसी ने उन्हें स्टेडियम जाते वक्त काले झंडे दिखा दिए या सड़े हुए अंडे या टमाटर या कोई पत्थर फेंक दिए तो पूरा हिमाचल शर्मिंदा होगा। तो सब आपके सामने है। आप कुछ नहीं कर सकते। आप सिर्फ हिमाचल के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं। अपने सुझाव और प्रतिक्रिया 9736023310 व्हाट्स एप या sml-edithead@sml.amarujala.com पर भेजें।