बेटियां होती हैं घर का चिराग, इन्होंने घर रोशन करके दिखाया
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मेरे जन्म के बाद घर में सब खुश थे लेकिन शायद बहुत खुश भी नहीं थे। घर में पहले से पांच लड़कियां थी। जैसे-जैसे बड़ी हुई मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं कहीं माता-पिता पर बोझ न बन जाऊं।
परिवार बड़ा था और कमाने वाले सिर्फ मेरे पिता ही हैं। वे ढाबा चलाते हैं। गरीबी की वजह से कई बार हौसला टूटने लगा लेकिन माता और पिता की प्रेरणा से मंजिल की तरफ कदम बढ़ते रहे।
एक ही परिवार में छह बहनें होने पर गांव के लोग तरह-तरह की बातें करते थे, लेकिन मेरे माता-पिता ने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया और मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। यही सोचकर दिल में कुछ करने की ठानी और मंजिल तय की।
बी फार्मेसी में हुई सिलेक्शन
पढ़ाई के साथ-साथ खेलों में भी मेरा रुझान था। जिला और राज्य स्तर पर मैंने प्रतिनिधित्व किया। राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला नोगली (रामपुर) से मैट्रिक के बाद मैंने जमा दो की परीक्षा 65 फीसदी अंकों के साथ उत्तीर्ण की।
पढ़ाई के दौरान कई मुश्किलें आईं। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। लेकिन माता-पिता के लिए कुछ करने का जज्बा मन था। इसीलिए प्लस टू के बाद बी-फार्मेसी का एंट्रेंस दिया और सिलेक्शन हो गई।
मैं अपने माता-पिता के लिए कुछ करना चाहती हूं। उनकी प्रेरणा से ही मुझे संघर्ष की राह मिली और आज मैं मंजिल तक पहुंची हूं। मैं अपनी सफलता श्रेय अपने माता-पिता को देती हूं।
और बहनें भी कम नहीं
मेरी बहनें भी मुझसे कम नहीं हैं। दो बहनें स्टाफ नर्स हैं और एक इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही हैं। आज मेरे पिता शोभा राम और माता सत्या देवी को हम बहनों पर गर्व है।