बर्फानी तेंदुए को बचाने के लिए तीन राज्यों में शुरू होगा खास प्रोजेक्ट
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समुद्र तल से 7500 फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर हिमालय पर्वत शृंखला में बिगड़ रहे ईको सिस्टम को बचाने के लिए तीन राज्यों हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर में एक विशेष प्रोजेक्ट शुरू किया जा रहा है।
यहां रहने वाले लोगों की जीवन शैली को सुधारने के अलावा स्नो लैपर्ड को संरक्षित करने की योजना है। यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम की ग्लोबल एनवायरनमेंट फैकल्टी तीन राज्यों में हाई हिमालयन एरिया कंजरवेशन एंड रेस्टोरेशन प्रोग्राम के तहत पर करीब 12 मिलियन डॉलर खर्च करने जा रही है।
बदलते पर्यावरण का असर हिमालय के इन ऊंचे इलाकों के ईको सिस्टम पर न पड़े, इसके लिए यूनाइटेड नेशन ने भारत सरकार और संबंधित राज्यों की सरकारों से मिलकर इस प्रोग्राम को चलाने की कवायद शुरू की है।
हाल ही में यूएनडीपी से जुड़े अधिकारियों ने हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर के अधिकारियों से मिलकर इस प्रोजेक्ट के लिए राज्यवार रिपोर्ट मांगी है। इस प्रोजेक्ट में भारत सरकार की ओर से वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, साइंस एंड टेकभनोलॉजी डिपार्टमेंट, राज्यों के वन्यजीव विभाग, कृषि व हार्टिकल्चर डिपार्टमेंट शामिल होंगे।
इसके अलावा स्नो लैपर्ड और ऊंचाई के इलाकों में पर्यावरण पर काम करने वाले एनजीओ को भी इस प्रोग्राम में भागीदार बनाया जाएगा। राज्यों से रिपोर्ट मिलने के बाद टीम रिपोर्ट को परखेगी और उसके बाद राज्यों को इस काम के लिए राशि जारी होगी।
साल दर साल कम हो रहे स्नो लैपर्ड
पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ एसएस नेगी बताते हैं कि दुनियाभर में अब सिर्फ चार हजार के करीब स्नो लैपर्ड बचे हैं। इनमें से करीब पांच सौ स्नो लैपर्ड भारत के इन पहाड़ी राज्यों के सुदूर इलाकों में पाए जाते हैं। पिछले बीस सालों में यह प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है।
इसका सबसे बड़ा कारण प्राकृतिक वासों का कम होना, शिकार होना और अब पर्यावरण में हो रहे बदलाव अहम कारण है। यही कारण है कि अब देश-दुनिया भर के वन्यजीव चिंतक हिमालय के ईको सिस्टम पर काम कर इसे बचाने का प्रयास कर रहे हैं।
शिकार की तलाश में घट रही है इंसानों से दूरी
स्नो लैपर्ड सामान्य तौर पर बकरियों, याक (पहाड़ी बैल) और नील गाय जैसे जीवों के शिकार पर निर्भर रहते हैं। चूंकि इन मवेशियों और जानवरों की संख्या धीरे-धीरे इन ऊंचे इलाके से कम हो रही है। लिहाजा, शिकार की तलाश में स्नो लैपर्ड आबादी के नजदीक पहुंच रहे हैं।
इसकी एक वजह लोगों का स्नो लैपर्ड के इलाके में घुसना भी है। ऐसे में इंसानों और स्नो लैपर्ड के एक दूसरे के सामने आने की संभावना बढ़ गई हैं। यह इंसानों के लिए तो खतरनाक है ही, साथ ही स्नो लैपर्ड के लिए भी शिकार के लिहाज से बेहद खतरनाक है।
लोगों के वैकल्पिक साधनों पर होगा काम
एसएस नेगी ने बताया कि इस प्रोजेक्ट में जहां स्नो लैपर्ड के प्राकृतिक वासों को संरक्षित करने का प्रयास होगा। वहीं, ऊंचाई पर रहने वाले लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाने पर भी फोकस रहेगा। प्रोजेक्ट में इस इलाके के लोगों को वैकल्पिक खान-पान, रहन-सहन के साधन, इलाके और माहौल मुहैया कराने का प्रयास होगा ताकि लोग स्नो लैपर्ड को निशाना न बनाएं।