अध्ययन में खुलासा: हिमाचल में वर्ष 2100 तक 33 फीसदी बढ़ेगी बारिश, फिर भी गहराएगा जलसंकट
अगले 74 वर्षों यानी साल 2100 तक यह जलवायु संकट खड़ा होने का पूर्वानुमान है। खूब वर्षा होने पर भी पानी टिकेगा नहीं, नदी-नालों में बाढ़ बनकर बहेगा।
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करीब सात दशक के बाद हिमाचल प्रदेश में बारिश 33 फीसदी बढ़ जाएगी, फिर भी जलसंकट गहराएगा। अगले 74 वर्षों यानी साल 2100 तक यह जलवायु संकट खड़ा होने का पूर्वानुमान है। खूब वर्षा होने पर भी पानी टिकेगा नहीं, नदी-नालों में बाढ़ बनकर बहेगा। सतही बहाव 95 से 125 प्रतिशत तक बढ़ेगा। इस अवधि में तापमान में भी 1 से 1.3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि संभव है। इसका कारण वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा, जीवाश्म ईंधनों जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस का अत्यधिक उपयोग, औद्योगिकीकरण, वनों की कटाई और भूमि उपयोग में बदलाव है। यह अध्ययन आईआईटी रुड़की के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन डिजास्टर मिटिगेशन एंड मैनेजमेंट से जुड़े शोधार्थी मयंक उपाध्याय व प्रो. अजंता गोस्वामी, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान (आईआईआरएस) देहरादून के वैज्ञानिक डॉ. प्रवीण कुमार ठाकुर व डॉ. पंकज धोटे ने संयुक्त रूप से किया है।
सुकेती जलग्रहण क्षेत्र पर किए अध्ययन में खुलासा
इसे मंडी जिले के 412 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले सुकेती जलग्रहण क्षेत्र पर किया गया है। इसे अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका फिजिक्स एंड केमिस्ट्री ऑफ अर्थ ने भी प्रकाशित किया है। इसमें चेतावनी दी गई है कि आने वाले दशकों में बाढ़, मृदा अपरदन और जल संकट बढ़ सकता है। नदियों, नालों में अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ जाएंगी। इससे भूजल संग्रह में कमी आएगी। दूसरी ओर, गर्मियों में झरनों और प्राकृतिक जल स्रोतों का प्रवाह घट जाएगा। इससे पेयजल और सिंचाई के लिए जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कहीं अधिक गंभीर होगा
अध्ययन में पाया गया कि भूमि उपयोग बदलाव की तुलना में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कहीं अधिक गंभीर होगा। वाटरशेड को दुरुस्त करने और भूजल को रिचार्ज करने में निवेश को महत्वपूर्ण बताया। शोधकर्ताओं ने जल संरक्षण और टिकाऊ जलग्रहण प्रबंधन उपायों को अपनाने पर जोर दिया है। इस अध्ययन में वर्ष 2100 तक के संभावित प्रभावों का आकलन किया गया।
पानी की सुरक्षा एवं आपदा के जोखिम को एक ही चुनौती के तौर पर देखना होगा
हिमाचल प्रदेश राज्य विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के निदेशक पुष्पेंद्र राणा ने कहा कि इन नतीजों से यह बात और पुख्ता होती है कि पानी की सुरक्षा और आपदा के जोखिम को एक ही चुनौती के दो पहलुओं के तौर पर देखा जाना चाहिए। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश में उतार-चढ़ाव और चरम मौसम की घटनाएं बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे वाटरशेड को बहाल करने, झरनों को फिर से जीवित करने और भूजल को रिचार्ज करने में निवेश करना उतना ही जरूरी हो जाएगा, जितना बाढ़ से निपटने के पारंपरिक उपाय जरूरी हैं।