हिमाचल प्रदेश: दुष्कर्म के आरोप से टिपर चालक बरी, 13 वर्षीय किशोरी ने अदालत में आरोपों से किया इनकार
शिमला की विशेष फास्ट ट्रैक पॉक्सो अदालत ने 13 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म और अपहरण के मामले में आरोपी टिपर चालक वीरू को बरी कर दिया। अदालत में पीड़िता समेत प्रमुख गवाहों ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। इसके अलावा डीएनए प्रक्रिया में गंभीर खामियां सामने आईं। इन परिस्थितियों में अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
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राजधानी शिमला की विशेष फास्ट ट्रैक अदालत (पॉक्सो) ने 13 वर्षीय किशोरी से दुष्कर्म और अपहरण के मामले में आरोपी टिपर चालक को बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के अपने बयानों से मुकरने और डीएनए जांच की प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाए जाने के बाद आरोपी को संदेह का लाभ दिया।
मामला 26 अगस्त 2025 का है। किशोरी के परिजनों ने कसुम्पटी पुलिस चौकी में उसके लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने जांच के दौरान नेपाल निवासी वीरू को आरोपी बनाया था। अभियोजन के अनुसार, आरोपी पर किशोरी को बहला-फुसलाकर तारादेवी से एक टिपर में हरियाणा ले जाने और वहां उसके साथ दुष्कर्म करने का आरोप था। पुलिस ने मामले में बीएनएस और पॉक्सो एक्ट के तहत केस दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया था।
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब उसकी मुख्य गवाह यानी पीड़िता ने ही पुलिस के आरोपों का समर्थन नहीं किया। अदालत में दिए बयान में किशोरी ने कहा कि तीज उत्सव के बाद देर हो जाने के कारण वह अपनी सहेली के घर रुक गई थी। उसने अदालत के समक्ष उसके साथ किसी तरह का गलत काम होने से इनकार किया।
पीड़िता के बयान से अभियोजन की पूरी कहानी पर सवाल खड़े हो गए। मामले में शिकायतकर्ता बुआ और दादी के अलावा पीड़िता की सहेली के बयान भी पुलिस के पक्ष में नहीं रहे। इन गवाहों के मुकरने से अभियोजन के आरोपों को साबित करना मुश्किल हो गया।
अदालत ने मामले में पेश किए गए डीएनए साक्ष्यों की प्रक्रिया में भी गंभीर खामियां पाईं। जांच के दौरान साक्ष्य जुटाने और डीएनए प्रक्रिया से जुड़े पहलुओं पर उठे सवालों के चलते अदालत ने अभियोजन के वैज्ञानिक साक्ष्य को भी आरोपी के खिलाफ निर्णायक नहीं माना।
अदालत ने कहा कि आपराधिक मामले में आरोपी के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित करना अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है। जब मुख्य गवाहों के बयान आरोपों का समर्थन नहीं करते और साक्ष्यों की प्रक्रिया में गंभीर कमियां हों, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना जरूरी है। इसी आधार पर अदालत ने वीरू को दुष्कर्म और अपहरण के आरोपों से बरी कर दिया।