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गुड़िया केस पर जिप बैठक में बरपा हंगामा, सदस्यों ने किया वॉकआउट

Sat, 29 Jul 2017 09:39 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला Updated Sat, 29 Jul 2017 09:39 AM IST
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Shimla Ruckus in zila parishad meeting

जिला परिषद की बैठक में कोटखाई के गुड़िया केस पर जमकर हंगामा बरपा। मामले की जांच करने वाले पुलिस अफसरों और उपायुक्त को निशाने पर लेते हुए जिप सदस्यों ने इनकी बर्खास्तगी की मांग कर डाली। सदन में जब इस मसले पर कोई बात नहीं बनी तो आधा दर्जन सदस्यों ने वॉकआउट कर दिया।

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कोटखाई के थरोला वार्ड से जिप सदस्य नीलम सरैक ने सबसे पहले ये मामला उठाया। पूछा कि आखिर उपायुक्त घटना के तुरंत बाद पीड़ित परिवार के घर क्यों नहीं पहुंचे, क्यों परिजनों से मिलने में 15 दिन लग गए। यदि डीसी समय पर पीड़ित परिवार के घर जाते तो न चक्का जाम होता और न ही थाना फूंकने की नौबत आती।
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उन्होंने सरकार से डीसी को बर्खास्त करने की मांग की। कहा कि इस मामले में सुस्ती बरतने वाले डीजीपी, आईजी और अन्य अफसरों को सस्पेंड नहीं बल्कि बर्खास्त किया जाना चाहिए। इन सदस्यों ने एसआईटी में शामिल हर अफसर की सीबीआई जांच की भी मांग की।
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सदन में तय हुआ कि इसे स्पेशल एजेंडा बनाकर चर्चा की जाएगी। लेकिन हंगामा शांत नहीं हुआ और जिप सदस्य नीलम सरैक, इंदू वर्मा, डीआर हस्टा, सीआर आजाद, रेखा मोगटा, वंदना मेहता, रीना ठाकुर, अरविंद धीमान और मदनलाल मेहता ने वॉकआउट कर दिया।

पुलिस अफसर के अभद्र व्यवहार पर गरमाया सदन
जिप सदस्या रीना ठाकुर के साथ पुलिस अफसर के किए गए अभद्र व्यवहार के मामले पर भी सदन गरमा गया। सदस्य दलीप कायथ ने पूछा कि ये शर्म की बात है कि अफसर के खिलाफ एक साल बाद भी जांच पूरी नहीं हुई। 

क्षेत्र से विधायक भी खुद महिला हैं मगर वे भी सदस्य को न्याय नहीं दिला पाईं। वहीं, सदस्या रीना ने इस सवाल को सूची से हटवा दिया। कहा कि जब अफसर पर कार्रवाई होनी ही नहीं है तो इस पर चर्चा का क्या फायदा।

सैंज में पुलिस वाले भेजे, तो गए कहां
सैंज में पुलिस की तैनाती पर भी हंगामा हुआ। शिमला पुलिस की ओर से डीएसपी बलवीर जसवाल ने बताया कि यहां के लिए तीन पुलिस कर्मी तैनात किए गए हैं। इस पर वार्ड सदस्य रेखा मोगटा ने कहा कि फील्ड में एक भी पुलिस कर्मी नहीं है। 

आखिर वहां भेजे पुलिस वाले कहां चले गए। डीएसपी ने कहा कि यदि जवान वहां नहीं पहुंचे तो उनके खिलाफ जांच होगी। बाकी सदस्य इससे भड़क गए और कहने लगे कि पुलिस अफसरों को पता ही नहीं कि स्टाफ फील्ड में है भी या नहीं।

अफसर सीएम की नहीं सुनते, हमारी कौन सुनेगा
ग्रामीण क्षेत्रों के अस्पतालों में खाली पदों को लेकर जिला परिषद की बैठक में तीखी बहस हुई। आनंदपुर वार्ड सदस्य मदन मोहन ने कहा कि जुन्गा अस्पताल एक डॉक्टर के सहारे चल रहा है। सीएम कुछ दिन पहले यहां खुद आए थे। 24 घंटे में सारे पद भरने आदेश दिए। सीएमओ, बीएमओ समेत स्वास्थ्य महकमे के अफसर भी वहीं थे।

इन्होंने उस समय हामी भरी मगर पद आज तक नहीं भरे गए। सदस्य ने कहा कि जब अफसर सीएम साहब के ऑर्डर नहीं मानते तो हम तो चीज ही क्या हैं। अस्पताल में न एक्सरे होते हैं न ही कोई टेस्ट। सदस्य दलीप कायथ ने खनेरी अस्पताल रीना ठाकुर ने कोटगढ़ तो इंदू वर्मा ने ठियोग अस्पताल का मामला उठाया।

पूछा कि आखिर कब खाली पद भरे जाएंगे। इस पर सीएमओ ने कहा कि जुन्गा के लिए एक और डॉक्टर के ऑर्डर हो गए हैं। बैठक में पंचायतों के तहत बने एंबुलेंस रोड पर भी चर्चा हुई। जिप सदस्य वंदना ने कहा कि जो सड़कें पंचायतों के तहत बनी हैं वे पास नहीं हो रहीं।

इससे गांवों में एंबुलेंस सुविधा नहीं मिल पाती। इन रोड पर कोई हादसा भी हो तो पास न होने से क्लेम नहीं मिलता। तय हुआ कि ये रोड पीडब्ल्यूडी के नियमों के तहत बनाए जाएंगे जबकि रोड पास करने संबंधी मामला सरकार को भेजा जाएगा।

जिप को मिला बजट, सदस्यों से मांगें प्रस्ताव
सरकार ने जिला परिषद को 4 करोड़ 22 लाख का बजट जारी कर दिया है। जिप अध्यक्ष धर्मिला हरनोट ने सभी सदस्यों को अपने अपने वार्ड के विकासकार्यों के प्रस्ताव तैयार करने को कहा। ये पैसा सामुदायिक भवन, महिला मंडल, युवक मंडल, मंदिर, पानी, सड़क निर्माण, खेल, फुट ब्रिज, चिल्ड्रन पार्क, पंचायत घर और पार्किंग जैसे कामों पर खर्च करना होगा।

मंत्री के कहने पर भी नहीं लिख रहे सस्ती दवाइयां
शिमला। सदस्य दलीप कायथ ने रामपुर अस्पताल में मरीजों को महंगी दवाएं लिखने का मामला उठाया। कहा कि मंत्री कौल सिंह ठाकुर के कहने के बावजूद अस्पताल में मरीजों को ब्रांडेड दवाएं खरीदने को मजबूर किया जा रहा है। इसमें केमिस्ट से मिलीभगत हो रही है। सीएमओ ने कहा कि लिखित शिकायत नहीं मिली है। इसकी जांच की जाएगी।


डस्टबिन जांच के आदेश
पंचायती राज विभाग के तहत पंचायतों में बने डस्टबिन के निर्माण में गड़बड़ी की जांच होगी। सदस्य नीलम सरैक ने कहा कि कई जगह डस्टबीन एक लाख तो कहीं 15 हजार में बनाए गए हैं। इसकी जांच होनी चाहिए कि आखिर इन्हें बनाने की क्या गाइडलाइन थी और पूरा पैसा इन पर इस्तेमाल हुआ भी या नहीं।

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