जानिए वह ख्वाहिश जिसके पूरा न होने से दुखी है शांता कुमार
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हाल ही में अपनी पार्टी के खिलाफ पत्र बम फोड़ने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं सांसद शांता कुमार के मन में दो बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद पूरे पांच साल जनता की सेवा न कर पाने की टीस आज भी है।
वे कहते हैं कि पार्टी उन्हें पांच साल और देती तो हिमाचल भारत में नंबर वन होता। देश और प्रदेश में चल रही राजनीतिक उथलपुथल के बीच शांता कुमार ने अमर उजाला को साक्षात्कार दिया। पेश हैं अमर उजाला के संवाददाता सुनील चड्ढा से की गई बातचीत के प्रमुख अंश :
सवाल: 10 जुलाई को अमित शाह को लिखे पत्र का क्या जवाब मिला?
जवाबः अभी उत्तर नहीं मिला। मेरी चिंता उनकी भी चिंता है। समय पर उचित कार्रवाई होगी।
चुनाव नहीं लड़ना चाहता था
सवालः कहा जा रहा है कि केंद्र में मंत्री न बनाए जाने से आप नाराज हैं, इसलिए पत्र लिखा?
जवाबः मैं तो चुनाव ही नहीं लड़ना चाहता था। पार्टी ने आग्रह किया तो मैंने चुनाव लड़ा।
सवालः आपको नहीं लगता कि आडवाणी सरीखे वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में लाकर उन्हें निष्क्रिय कर दिया गया है?
जवाबः ऐसे नेता निष्क्रिय कभी नहीं होते। उनका मौन बोलने से भी अधिक बोलता है। इतना जरूर है कि एक आदर्श परिवार में बड़ों का सम्मान और नए-छोटों का स्वागत होना चाहिए।
सवालः सूबे की सियासी जंग अब दिल्ली से लड़ी जा रही है। शुरुआत भाजपा ने की। आप क्या कहेंगे?
जवाबः राजनीति में केवल आरोप-प्रत्यारोप दुर्भाग्यपूर्ण हैं। नेताओं की छवि पहले ही खराब है। इस नए आरोप युद्ध से राजनीति में अवमूल्यन और अधिक बढ़ जाएगा।
हिमाचल की राजनीति निराश करने वाली
सवालः हिमाचल की राजनीति में लौटेंगे?
जवाबः हिमाचल मेरा घर है। अपने घर लौटकर कौन नहीं आना चाहता। लेकिन राजनीति में नहीं... पूरी राजनीति से निराश हूं। कई बार लगता है इस महफिल में हमारा कोई काम नहीं। लेकिन पलायन भी नहीं करूंगा। जिन आदर्शों के लिए जिया हूं, उनके लिए अंतिम सांस तक लड़ता रहूंगा।
सवालः लगता है कि आपकी पार्टी ने ही आपको कमजोर कर हाशिए पर डाल दिया है?
जवाबः ईश्वर ने और पार्टी ने मुझे बहुत कुछ दिया है। कमजोर तो मैं तब बनूंगा, जब मेरी खुद्दारियां थकने लगेंगी और मैं अपने आदर्शों से समझौता करूंगा।
सवालः चर्चा है कि आप भी बिहार के शत्रुघ्न सिन्हा की राह पर हैं?
जवाबः हर्गिज नहीं। मुझे सार्वजनिक जीवन में 60 वर्ष हो गए हैं। मैं शांता कुमार हूं और वही रहूंगा। बनी-बनाई राहों पर कभी नहीं चला। अपनी राहें खुद बनाईं। चलकर दिखाया और मूल्य भी चुकाया... पर फिर भी मुस्कुराता रहा।
ये है शांता की अधूरी ख्वाहिश
सवालः किसी से कोई गिला-शिकवा?
जवाबः प्रभु का, पार्टी का और सबका आभारी हूं। 1977 और 1990 में हिमाचल का मुख्यमंत्री बना पर समय पूरा नहीं मिला। 1980 में दिल्ली की राजनीति में दलबदल के कारण और 1992 में अयोध्या का ढांचा गिरने पर सरकार चली गई। दोनों बार समय अधूरा मिला लेकिन जिन्हें पूरा समय मिला, उनसे भी ज्यादा काम और उपलब्धियां हासिल कीं। बस मलाल इतना है कि पार्टी मुझे पांच वर्ष और दे देती है तो हिमाचल हर दृष्टि से भारत में सबसे आगे होता।
सवालः आपके सीएम कार्यकाल की बड़ी उपलब्धियां?
जवाबः पहली बार लाखों घरों को पीने का पानी दिया। पानी का विभाग बनाया। अंत्योदय योजना से हजारों लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठाए। पनबिजली परियोजनाओं में केंद्र की कांग्रेस सरकार से रॉयल्टी स्वीकार करवाई। सामाजिक पेंशन शुरू की। पन बिजली परियोजनाओं में निजी क्षेत्रों को आमंत्रित किया।